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संपादकीयः हरित संस्कार

एक जागरूक समाज अपने आसपास की आबोहवा को स्वच्छ और जीवन को स्वस्थ बनाने की पहल खुद करता है। कई बार समाज में मौजूद सुविधाओं की सीमा और जरूरत के साथ ऐसी परंपराएं विकसित होती हैं, जो लोगों की आस्था से जुड़ जाती हैं।
Author February 4, 2016 02:34 am

एक जागरूक समाज अपने आसपास की आबोहवा को स्वच्छ और जीवन को स्वस्थ बनाने की पहल खुद करता है। कई बार समाज में मौजूद सुविधाओं की सीमा और जरूरत के साथ ऐसी परंपराएं विकसित होती हैं, जो लोगों की आस्था से जुड़ जाती हैं। लेकिन वक्त बदलने के साथ आमतौर पर उसका नुकसान पर्यावरण और फिर समूचे समाज को उठाना पड़ता है। इसी के मद्देनजर एक याचिका की सुनवाई के दौरान एनजीटी यानी राष्ट्रीय हरित पंचाट ने लकड़ियां जला कर किए जाने वाले पारंपरिक दाह-संस्कार को पर्यावरण के लिए घातक बताते हुए पर्यावरण मंत्रालय और दिल्ली सरकार से कहा है कि वे शवदाह के वैकल्पिक तरीके उपलब्ध कराने की पहल करें।

पंचाट ने यह भी कहा कि इस मसले पर लोगों की सोच या विचारधारा बदलने और बिजली या सीएनजी यानी प्राकृतिक गैसों से शवदाह जैसे पर्यावरण हितैषी तरीके अपनाने की जरूरत है। दरअसल, व्यक्ति की मृत्यु के बाद देह का विसर्जन एक ऐसा मामला है, जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोग अपनी परंपराओं के हिसाब से अंतिम क्रिया करते हैं। इसमें एक बड़ा हिस्सा धार्मिक परंपरा के मुताबिक अपने किसी परिजन की मौत के बाद शरीर का दाह-संस्कार करता है।

इसमें शव को लकड़ियों पर खुली जगह में जलाना पड़ता है। इस तरह परंपरा का निर्वहन तो हो जाता है, लेकिन पर्यावरण में जो धुआं और रासायनिक प्रदूषण घुलता है, उसका लोगों की सेहत पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। फिर अस्थियां और कुछ खास स्थितियों में मृतक को नदी में बहा देने से नदियां भी प्रदूषित होती हैं। जबकि इन दिनों अनेक जगहों पर विद्युत और सीएनजी से शवदाह की सुविधा मौजूद है। इसके अलावा, मौत के बाद देह के विभिन्न अंगों के उपयोग के मद्देनजर चिकित्सा विज्ञान को उसका दान करना भी एक बेहतर और मानवीय विकल्प है।

कई बार लोग परंपरागत तरीके से दाह-संस्कार के नुकसान को समझते हैं, लेकिन आस्था का सवाल होने के चलते इस तौर-तरीके पर विचार करने के लिए तैयार नहीं होते। जाहिर है, समाज में सदियों से चली आ रही परंपराएं लोगों के मन में इस कदर गहरे पैठ जाती हैं कि उनके नफा-नुकसान के बारे में सोचना जरूरी नहीं समझा जाता। इस संदर्भ में हरित पंचाट ने ठीक ही कहा है कि यह नेतृत्व करने वालों और खासकर सरकार का दायित्व है कि वे आस्थाओं का रुख एक नई दिशा की ओर मोड़ें, लोगों की विचारधारा में बदलाव लाएं और साथ ही नागरिकों के लिए दाह-संस्कार के लिए पर्यावरण के अनुकूल उपाय मुहैया कराएं।

एक मुश्किल यह भी है कि आमतौर पर भावनाओं और आस्था के चलते पैदा होने वाली समस्याओं के बारे में जो लोग ठीक से जानते हैं, उनकी ओर से सही परिप्रेक्ष्य में और लोगों की समझ के अनुकूल किसी उचित तरीके को पेश नहीं किया जाता। खासकर मृतक के प्रति उसके परिजन भावनाओं के गहरे स्तर पर जुड़े रहते हैं। यही वजह है कि परंपराओं में जीने वाले लोग अपने किसी प्रिय की मौत के बाद उसके शव के अंतिम संस्कार के लिए गैर-परंपरागत तरीके अपनाने की बात पर आहत भी हो जाते हैं। यही स्थिति इस बात की जरूरत रेखांकित करती है कि इस मसले पर समाज को जागरूक बनाने और विचारधारा में बदलाव के लिए बहुत संवेदनशील होकर लोगों की सोच के अनुकूल भाषा में परंपरा के बरक्स यथार्थ में उससे होने वाले नफा-नुकसान के बारे में समझ विकसित करनी होगी।

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  1. आनंद
    Feb 4, 2016 at 6:02 pm
    पर्यावरण के संरक्षण के लिये जो भी प्रयास हों उनका स्वागत होना चाहिये लेकिन ऐसे-ऐसे उदाहरण चुने जाते हैं कि जिसमें दिखाया जाता है जैसे शव-दाह की पारंपरिक प्रथाएँ ही आज के प्रदूषण के लिये जिम्मेवार हैं। क्योंकि बिजली और सीएनजी का तो कोई कार्बन फुट-प्रिंट ही नहीं होगा। उन गांवों का क्या होगा जहाँ एक झोपड़ी रौशन के लिये लिये बिजली नहीं हैै, शव-दाह के लिये कहाँ से आएगी बिजली? येल विश्वविद्यलय के एक शोध के अनुसार पूरे कार्बन प्रदूषण में लकड़ियों के जलाने से होने वाले प्रदूषण का हिस्सा २% ही है।
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