किसी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा पीढ़ी की आंखों में पलते सपने होते हैं। मगर जब देश की कुल आबादी में एक बड़ी संख्या में युवा पढ़ाई, रोजगार और प्रशिक्षण- तीनों से बाहर खड़े हों तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं रह जाता। यह सरकार के उन दावों को आईना दिखाता सवाल है जिसे अक्सर अर्थव्यवस्था की चमकती तस्वीर से ढकने की कोशिश की जाती है।
गौरतलब है कि नीति आयोग ने हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि देश में 15 से 29 वर्ष की आयु के करीब आठ करोड़ सत्तर लाख (8.7 Crore) युवा ऐसे हैं जो न तो कोई पढ़ाई कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। अगर इतनी बड़ी संख्या में युवा एक तरह से खाली बैठे हैं तो आखिर किस आधार पर सरकार की ओर से यह दावा किया जाता है कि युवा आबादी ही देश की ताकत है और वही भविष्य की दिशा तय करेगी।
बड़ी युवा आबादी शिक्षा से लेकर रोजगार तक के अवसरों के दायरे से बाहर
विचित्र है कि एक ओर रोजगार सृजन और करोड़ों युवाओं को अवसर मुहैया कराने के दावे किए जाते हैं, वहीं इतनी बड़ी युवा आबादी शिक्षा से लेकर रोजगार तक के अवसरों के दायरे से बाहर है। सरकारें घोषणाओं से उम्मीदें जगा सकती हैं मगर युवाओं को ऐसे कौशल और रोजगार के वास्तविक अवसरों की जरूरत है ताकि वे अपना भविष्य थोड़ा बेहतर बना सकें। उन्हें योजनाओं की लंबी सूची नहीं, सही समय पर उचित मार्गदर्शन चाहिए। हुआ यही है कि रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ते गए हैं।
आज हालत यह है कि युवाओं को न तो अपनी पढ़ाई जारी रखने की स्थिति दिख रही है और न ही वे अपने बूते या सरकारी मदद से रोजी-रोटी का कोई जरिया तैयार कर सकने में सक्षम हैं। एक सवाल यह भी है कि जब मुद्रा ऋण से लेकर अन्य कई तरह की योजनाएं सरकार की ओर से चलाने का दावा किया जा रहा है तो उनका लाभ युवाओं तक क्यों नहीं पहुंच रहा?
क्या कहते हैं नीति आयोग के आंकड़े
सरकार को इस मुश्किल सवाल का सामना करना चाहिए क्योंकि जिस देश में करोड़ों हाथ काम की तलाश में हों, वहां केवल विकास के दावे पर्याप्त नहीं होते। सरकार करोड़ों नौकरियों के अलावा युवाओं को विभिन्न ऋण योजनाओं से मिलने वाली सहूलियतों के बारे में बताती रहती है लेकिन नीति आयोग के आंकड़े अलग ही तस्वीर दिखा रहे हैं।
