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संपादकीयः आरक्षण की कसौटी

आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार द्वारा बनाई गई पिछड़ा वर्ग-सी श्रेणी के तहत जाटों और पांच अन्य समुदायों को दिए गए आरक्षण पर रोक लगा दी।

Author May 27, 2016 3:05 AM
जाट आंदोलन की फाइल फोटो

आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार द्वारा बनाई गई पिछड़ा वर्ग-सी श्रेणी के तहत जाटों और पांच अन्य समुदायों को दिए गए आरक्षण पर रोक लगा दी। न्यायालय का यह फैसला जहां हरियाणा सरकार के लिए झटका है, वहीं सत्तारूढ़ पार्टी समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए सबक भी है। मगर इस फैसले पर शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ हो। दरअसल, इसकी संभावना शुरू से थी कि राज्य सरकार का निर्णय न्यायिक समीक्षा में नहीं टिक पाएगा। पर जहां सियासी खेल साधना ही मकसद हो, वहां इसकी परवाह कौन करे! गौरतलब है कि दो महीने पहले हरियाणा सरकार ने एक विधेयक लाकर जाटों और पांच अन्य समुदायों के लिए सरकारी नौकरियों तथा सरकारी व सरकार से अनुदान-प्राप्त शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था कर दी।

यह साफ तौर पर जाटों के उग्र आंदोलन के आगे घुटने टेकना था। राज्य सरकार जानती थी कि वह जो करने जा रही है वैसा ही पिछली सरकार ने भी किया था, पर उसे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। यही नहीं, पिछले लोकसभा चुनावों से ऐन पहले, केंद्रीय सेवाओं में जाटों को आरक्षण देने का यूपीए सरकार का निर्णय भी साल भर बाद सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहरा दिया था। गौरतलब है कि सर्वोच्च अदालत ने आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास फीसद तय कर रखी है। लेकिन तब अपने फैसले में अदालत ने यह भी कहा था कि जाट शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ेपन की शर्त पूरी नहीं करते, इसलिए वे आरक्षण के हकदार नहीं हैं। फिर भी खट््टर सरकार ने पचास फीसद की सीमा लांघ कर पिछड़े वर्ग की एक नई यानी ‘सी’ श्रेणी बना दी। उसे लगा होगा कि इस तरह वह जाट समुदाय को संतुष्ट कर पाएगी, जो कि हरियाणा का सबसे ताकतवर समुदाय है। यह दरअसल, दोहरा खेल था। यह नया आरक्षण अदालत के आदेश की भेंट चढ़ जाए, तो राज्य सरकार या भाजपा कह सकती है कि हमने तो दे दिया था, अदालत ने अड़ंगा लगा दिया।

राजनीतिक उलटफेर कर सकने लायक किसी समुदाय की नाराजगी न मोल लेनी पड़े, इसलिए हरियाणा सरकार के विधेयक का सभी दलों ने समर्थन किया था। हरियाणा के बाद भाजपा ने यही दांव गुजरात में भी खेला। पाटीदारों के बीच अपना आधार खिसकने के डर से ‘आर्थिक पिछड़ों’ के लिए दस फीसद आरक्षण की घोषणा कर दी। उसका भी क्या हश्र होगा, इसका अंदाजा पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट के ताजा फैसले से लगाया जा सकता है। अलबत्ता हाइकोर्ट का यह अंतरिम फैसला है, पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व में दिए निर्देशों और निर्णयों की पृष्ठभूमि में यह अनुमान किया जा सकता है कि हाइकोर्ट का अंतिम फैसला क्या होगा, और अगर उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, तो आखिरकार नतीजा क्या आएगा।

इसलिए अच्छा होगा कि आरक्षण की नई-नई मांगों को हवा देने का सिलसिला बंद हो। अलबत्ता आरक्षण को अधिक तर्कसंगत बनाने की पहल जरूर की जानी चाहिए, जिसकी ओर सर्वोच्च अदालत ने भी अपने एक फैसले में संकेत किया था। उसने सवाल उठाया था कि आरक्षण की सूची में नई भर्ती तो कर दी जाती है, इस सूची से किसी को बाहर करने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की गई; क्या किसी लाभार्थी समुदाय की हालत में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं आ पाया है? दूसरा तकाजा यह है कि कृषि समेत असंगठित क्षेत्र की आर्थिक सुरक्षा बढ़ाने वाली नीतियां अपनाई जाएं और उन्हें प्राथमिकता दी जाए। पर समस्या यह है कि इसके लिए जो राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए, वह हमारे राजनीतिक दलों व राज्यतंत्र में कहीं नजर नहीं आती।

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