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मतदान की कसौटी

पहली बार नवंबर 2014 में, गुजरात सरकार ने जब स्थानीय निकाय संशोधन विधेयक पारित कर अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की, तब भी इस पर सवाल उठे थे।

Author नई दिल्ली | February 29, 2016 12:23 AM
जम्मू कश्मीर और झारखंड में मतगणना के दौरान की तस्वीर (फाइल फोटो भाषा)

भारत जैसे देश में अनिवार्य मतदान वैसे भीएक अव्यावहारिक व्यवस्था होगी। लेकिन अगर किन्हीं हालात में यह लागू भी हो तो इससे सबसे पहले लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को नुकसान पहुंचेगा। इसलिए पिछले हफ्ते सरकार ने एक निजी विधेयक के जरिए की गई अनिवार्य मतदान की मांग को खारिज करके एक सही फैसला किया है। कानूनमंत्री सदानंद गौड़ा का यह जवाब अपने आप में इस मांग के औचित्य पर सवाल उठाता है। उन्होंने कहा कि देश में लगभग पच्चीस करोड़ लोग आम चुनाव में हिस्सा नहीं लेते और इतनी बड़ी आबादी को इसके लिए दंडित करना न सिर्फ अव्यावहारिक और असंभव है, बल्कि गैरजरूरी और अलोकतांत्रिक भी है। जाहिर है, इस मसले पर उन्होंने फिलहाल केंद्र सरकार का रुख साफ कर दिया है। यह मांग छिटपुट तौर पर उठती रही है, जिसे आमतौर पर अव्यावहारिक ही माना गया। खुद निर्वाचन आयोग इस पर एतराज जता चुका है।

पहली बार नवंबर 2014 में, गुजरात सरकार ने जब स्थानीय निकाय संशोधन विधेयक पारित कर अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की, तब भी इस पर सवाल उठे थे। दरअसल, अनिवार्य मतदान की पहल गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी ने की थी; उस दौरान 2009 और 2010 में राज्य विधानसभा में संबंधित विधेयक पारित किया गया था। लेकिन गुजरात की तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने उसे दोनों बार यह तर्क देते हुए नामंजूर कर दिया था कि मतदाता को वोट डालने के लिए मजबूर करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है। अगर यह व्यवस्था अनिवार्य बनाई जाती है तो इससे संविधान के अनुच्छेद-21 का उल्लंघन होता है, जिसके तहत हर नागरिक को वैयक्तिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हासिल है। मगर ओपी कोहली गुजरात के राज्यपाल बने तो उन्होंने उस विधेयक को मंजूरी दे दी।

किसी भी कानून की सार्थकता उस पर अमल और उसकी व्यावहारिकता से सुनिश्चित होती है। अनिवार्य मतदान न केवल लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रतिकूल है, बल्कि भारत जैसे देश में यह घोर अव्यावहारिक भी है। जिस देश में अलग-अलग कारणों से एक बड़ी आबादी मतदान नहीं कर पाती, वहां पहले उन वजहों पर विचार करने की जरूरत है। फिर करीब दस करोड़ से ज्यादा मजदूर रोजी-रोटी के सिलसिले में एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं। जरूरी नहीं कि जिस वक्त चुनाव और मतदान हो, वे अपने मूल स्थान पर मौजूद रहें ही। उन्हें कानून के कठघरे में खड़ा करना क्या न्यायसंगत होगा! खासकर तब, जब ऐसे ज्यादातर लोगों के सामने गुजारे के लिए बाहर जाने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं होता।

ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, फिजी और यूनान और यहां तक कि महज तीन लाख की आबादी वाले देश तस्मानिया ने भी अपने यहां अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की, मगर यह कहीं भी सफल नहीं हुआ। यह दिलचस्प है कि जिन पश्चिमी देशों में ऐसा प्रावधान किया गया, वहां चुनावों में लोगों की भागीदारी लगातार कम हो रही थी, जबकि भारत में खुद चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि पिछले पच्चीस सालों के दौरान अमूमन हर अगले चुनाव में जन-भागीदारी बढ़ी है। यों भी, एक मजबूत लोकतंत्र सिर्फ मतदान के अधिक प्रतिशत पर नहीं, बल्कि अपने बुनियादी मूल्यों तथा नागरिक अधिकारों की रक्षा के प्रबंध और परिपाटी पर टिका होता है। लोकतंत्र के इसी तकाजे को और परिपुष्ट करने की जरूरत है।

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