संकट और चुनौती

ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (सीओपी 26) में सभी देश कार्बन उत्सर्जन पर चिंतित दिख रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र में जलवायु सम्मेलन को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेंद्र माेेदी। फााइल फोटो।

ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में चल रहे संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (सीओपी 26) में सभी देश कार्बन उत्सर्जन पर चिंतित दिख रहे हैं। किसी को नहीं सूझ रहा कि कार्बन उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य कैसे हासिल हो पाएगा। गौरतलब कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए अब तक जितने भी लक्ष्य निर्धारित किए जाते रहे हैं, उन्हें हासिल करने की दिशा में उतने प्रयास दिखे नहीं।

इसलिए यह काम अब पहाड़ जैसी चुनौती बन गया है। बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि जिन देशों को इस दिशा में पहल करनी है, वे खुद ही इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। रूस, चीन और ब्रिटेन सहित कई देश इस जमात में शामिल हैं। सबके सामने संकट कोयले से चलने वाले बिजलीघरों को हटाने का है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इस सदी में हालात काबू नहीं आए और कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो भयानक प्राकृतिक आपदाओं से कोई नहीं बचा पाएगा। इसलिए कार्बन उत्सर्जन के मुद्दे पर ग्लासगो सम्मेलन में कितनी कामयाबी मिलती है, काफी कुछ इसी पर निर्भर करेगा।

कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लक्ष्यों को लेकर भारत ने जो प्रतिबद्धता जाहिर है, वह मामूली नहीं है। भारत ने सन 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य का एलान कर दुनिया को संदेश दिया है कि अगर इस दिशा में ईमानदारी के साथ सतत प्रयास हों तो यह लक्ष्य नामुमकिन नहीं है। भारत ने ऐसा करके दिखाया भी है। चाहे राष्ट्रीय स्वच्छता अभियान, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना हो या फिर सौर ऊर्जा मिशन जैसे अभियान हों, भारत तेजी से जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को कम करने के प्रयास कर रहा है। भारत दुनिया का दूसरी सर्वाधिक आबादी वाला देश है। यह भी हकीकत है कि आबादी की तुलना में संसाधनों की भारी कमी है।

ऐसे में भारत के लिए कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्यों को हासिल करना कम चुनौतीपूर्ण नहीं है और इसमें लंबा वक्त लगेगा। पेट्रोल और डीजल के वाहनों से भारी प्रदूषण होता है। इसके लिए बिजली से चलने वाहनों को सड़क पर उतारने की मुहिम तेजी से चलानी होगी। शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिए भारत ने चरणबद्ध तरीके से काम करने की रूपरेखा पेश की है। पहला लक्ष्य तो यही कि इस दशक के अंत यानी 2030 तक हम अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का आधा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा से पूरा करेंगे और कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन तक की कमी लाएंगे।

भारत के सामने बड़ा संकट कोयले से चलने वाले बिजलीघर हैं। इससे निजात पाए बिना शून्य कार्बन कटौती का लक्ष्य हासिल कर पाना संभव नहीं है। यह तभी हो पाएगा जब कोयले से बनने वाली बिजली का विकल्प सामने हो। अभी हमारे परमाणु बिजलीघरों में जितनी बिजली बन रही है, वह कुल ऊर्जा जरूरत का बहुत छोटा हिस्सा है, तीन फीसद से भी कम। परमाणु बिजलीघरों के लिए यूरेनियम की जरूरत पड़ती है। भारत चूंकि न्यूक्लियर सप्लायर समूह (एनएसजी) का सदस्य नहीं है, इसलिए आसानी से यूरेनियम हासिल कर पाना उसके लिए संभव नहीं है।

भारत को एनएसजी का सदस्य बनाने का चीन विरोध करता रहा है। यह ऐसा संकट है जिसकी वजह से हम परमाणु ऊर्जा की दिशा में नहीं बढ़ पा रहे हैं। ऐसे में भारत शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य कैसे हासिल कर पाएगा? ऐसे मुद्दों पर दुनिया के उन देशों को पहल करने की जरूरत है जो जलवायु संकट पर सबसे ज्यादा चिंता जताते रहे हैं और इससे निपटने की जिम्मेदारी विकासशील तथा गरीब देशों पर डालते रहे हैं।

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