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फैसले के मायने

सोमवार को आए सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से हमारे जनतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को और बल मिला है।

Author January 3, 2017 12:24 AM
सुप्रीम कोर्ट की तस्वीर। (फाइल फोटो)

सोमवार को आए सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से हमारे जनतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को और बल मिला है। न्यायालय ने कहा है कि कोई भी उम्मीदवार धर्म और जाति के आधार पर वोट नहीं मांग सकता। यह कोई ऐसी बात नहीं है जो अदालत के फैसले से पहली बार सामने आई हो। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 123 (3) साफ कहती है कि कोई भी उम्मीदवार या उसका एजेंट धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकता। संविधान पीठ ने इस प्रावधान की ही पुष्टि की है। धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान की एक बुनियादी मान्यता है, और दूसरे तमाम कानूनों के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व कानून में भी यह हमेशा प्रतिबिंबित होती रही है। फिर, कोई उम्मीदवार धर्म या जाति के आधार पर वोट नहीं मांग सकता यह दोहराने की जरूरत सर्वोच्च अदालत या संविधान पीठ को क्यों महसूस हुई? दरअसल, इसकी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च अदालत का ही एक फैसला है जो हमेशा विवाद का विषय रहा है।

मुंबई उच्च न्यायालय के एक फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में कहा था कि हिंदुत्व धर्म नहीं, एक जीवन शैली या जीवन जीने का तरीका है। यह उन लोगों को खूब रास आया जो हिंदुत्व का राजनीतिक इस्तेमाल करते आए हैं। सांप्रदायिकता का आरोप लगने पर अपने बचाव में वे जब-तब सुप्रीम कोर्ट के 1995 के फैसले का हवाला भी देते रहे हैं। लेकिन उस फैसले की तर्ज पर तो इस्लाम या ईसाइयत की बाबत भी कहा जा सकता है कि यह जीवन जीने का एक तरीका है। अदालत का काम किसी धर्म को परिभाषित करना नहीं, सिर्फ यह देखना है कि धर्म का गैर-कानूनी इस्तेमाल और धार्मिक आधार पर पक्षपात या भेदभाव न हो। जाने क्यों, संविधान पीठ ने इक्कीस साल पहले के उस विवादास्पद फैसले पर फिर से गौर करने से मना कर दिया। पर उसकी ताजा टिप्पणी से साफ है कि उसकी चिंता किसी धर्म को परिभाषित करने की नहीं, बल्कि चुनाव की मर्यादा की रक्षा को लेकर है। और यह बिल्कुल वाजिब रुख है। अलबत्ता चुनाव में धर्म और जाति के इस्तेमाल को रोकना आसान नहीं हो सकता। दरअसल, यह एक ऐसी चुनौती है जिससे महज कानून के दम पर नहीं, बल्कि अधिकांशत: राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता के बल पर ही पार पाया जा सकता है।

कानून और न्यायालय तभी कार्रवाई कर सकते हैं कि जब उम्मीदवार या उसके एजेंट की तरफ से धर्म या जाति के आधार पर वोट देने की अपील करने के सबूत पाए जाएं। मगर धर्म और जाति के नाम पर होने वाले सियासी खेल बहुत सारे तरीकों से चलते रहते हैं। किसी उम्मीदवार या पार्टी-नेता का मंदिर में जाकर दर्शन-पूजन करना, धार्मिक समारोहों में हिस्सा लेना, इफ्तार की दावत देना आदि ऐसे ढेरों तरीके हैं। इसी तरह सीधे जाति के नाम पर वोट न मांग कर उस जाति के समारोह या सम्मेलन में हिस्सेदारी करके भी नेतागण, उम्मीदवार और उनके समर्थक जो ‘संदेश’ देना चाहते हैं देते रहते हैं। क्या इन सब चीजों से कानून के बल पर निपटा जा सकता है? फिर, कई बार जाति का मसला जातिवाद का नहीं होता, बल्कि कमजोर समुदायों के साथ हुई किसी ज्यादती की मुखालफत या उनकी किसी सामाजिक, शैक्षिक मांग से भी जुड़ा हो सकता है। क्या ऐसे मुद््दों को उठाना गैर-कानूनी होगा? शायद ऐसे ही सवालों की वजह से संविधान पीठ में सर्वसम्मति नहीं बन पाई होगी, और पीठ के सात में से तीन जजों ने फैसले से असहमति जताई है।

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