दाखिले का रुख

पिछले कुछ सालों में यह देखा गया कि कुछ राज्यों में दसवीं या बारहवीं की परीक्षा के नतीजों में सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन बेहतर हुआ है।

School, Jansatta Editorial Story
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस फोटो)

पिछले कुछ सालों में यह देखा गया कि कुछ राज्यों में दसवीं या बारहवीं की परीक्षा के नतीजों में सरकारी स्कूलों का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। इससे एक संकेत यह निकलता है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई का स्तर पहले के मुकाबले अच्छा हुआ है। अगर इस वजह से अभिभावकों की दिलचस्पी अपने बच्चों की पढ़ाई सरकारी स्कूलों में कराने में बढ़े तो यह एक महत्त्वपूर्ण बदलाव होगा। यह छिपा नहीं है कि सरकारी स्कूलों को शिक्षा के गिरते या कमजोर स्तर के लिए जाना जाने लगा था।

वहां बुनियादी सुविधाओं की बदहाली से लेकर पढ़ाई-लिखाई के माहौल के अभाव को लेकर चिंताएं जताई जाने लगी थीं। ऐसी कई वजहों से हाल के दशकों में यह धारणा बनी है कि पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता के मामले में सरकारी के मुकाबले निजी स्कूल बेहतर हैं। इसलिए सीमित संसाधनों के बावजूद लोग अपने बच्चों की शिक्षा को लेकर निजी स्कूलों की ओर आकर्षित हुए। लेकिन अब लोग अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में करा रहे हैं तो क्या इसके पीछे मुख्य कारण गुणवत्ता आधारित शिक्षा है? या फिर कोरोना के दौर में लोगों की आय में असंतुलन के साथ कुछ अन्य अहम वजहें भी जुड़ गई हैं?

गौरतलब है कि वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट यानी एएसईआर, 2021 के ताजा आकलन के मुताबिक पिछले तीन साल में विद्यार्थियों का झुकाव निजी स्कूलों से सरकारी स्कूलों की ओर बढ़ा है। यों यह झुकाव देश भर में देखा जा सकता है, लेकिन खासतौर पर उत्तर प्रदेश और केरल के सरकारी स्कूलों में होने वाले दाखिलों में ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई। छह से चौदह वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के लिए निजी स्कूलों में दाखिलों की संख्या 2018 में जहां 32.5 फीसद थी, वहीं 2021 में यह घट कर 24.4 फीसद रह गई। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में दाखिले का आंकड़ा 2018 में औसतन 64.3 फीसद था, जो इस साल बढ़ कर 70.3 फीसद पर पहुंच गया। जबकि 2006 से 2014 तक निजी स्कूलों में दाखिले की संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखी गई थी।

इस संदर्भ में एक अहम प्रवृत्ति पर गौर किया जा सकता है कि निजी स्कूलों में होने वाले दाखिलों में आज भी लड़कियों के मुकाबले लड़कों के लिए ज्यादा संभावनाएं हैं। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में लड़कियों की तादाद पहले भी लड़कों को मुकाबले ज्यादा थी और अब भी इसमें वृद्धि जारी है।
जाहिर है, भारतीय परिवारों में बेहतर शिक्षा या दूसरी सुविधाएं मुहैया कराने के मामले में लड़कियों के मुकाबले लड़कों को तरजीह देने की दुराग्रही मानसिकता रही है। और चूंकि गुणवत्ता आधारित शिक्षा के मामले में निजी स्कूलों को बेहतर माना जाता रहा है, इसलिए सामान्य दिनों के साथ-साथ आज भी उनमें लड़कों के लिए ज्यादा संभावनाएं देखी जा रही हैं।

लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि निजी के बजाय सरकारी स्कूलों की ओर आम लोगों के बढ़ते आकर्षण की मुख्य वजह शिक्षा की गुणवत्ता नहीं, बल्कि पिछले दो सालों में उपजी आर्थिक परिस्थितियां हैं। कोरोना संक्रमण की वजह से पूर्णबंदी और अन्य पाबंदियों की वजह से भारी तादाद में लोगों का रोजगार चला गया, व्यवसाय ठप पड़ने या अन्य बाधाओं की वजह से आय के स्तर में बड़ी गिरावट आई।

यही वजह है कि लोगों ने खर्च में कटौती के लिए अपने बच्चों को निजी स्कूलों से हटा कर सरकारी स्कूलों में भेजा। अगर अपने मुश्किल दिनों में लोगों ने सरकारी स्कूलों का रुख किया है तो अब यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सरकारी स्कूलों को गुणवत्ता आधारित शिक्षा से लेकर बुनियादी ढांचे की कसौटी पर निजी विद्यालयों के समांतर खड़ा करे, ताकि शिक्षा अपने मकसद में कामयाब हो।

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