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प्रबल प्रतिरक्षा

सक्षम राष्ट्र वही कहलाते हैं, जो हर स्तर पर खुद को ताकतवर बना लेते हैं। चाहे वह अर्थव्यवस्था हो, प्रतिरक्षा या फिर आंतरिक सुरक्षा का मोर्चा। दुनिया के विकासशील देशों को इन स्तरों पर खुद को तैयार करने में खासी मशक्कत करते देखा जाता है।

सांकेतिक फोटो।

सक्षम राष्ट्र वही कहलाते हैं, जो हर स्तर पर खुद को ताकतवर बना लेते हैं। चाहे वह अर्थव्यवस्था हो, प्रतिरक्षा या फिर आंतरिक सुरक्षा का मोर्चा। दुनिया के विकासशील देशों को इन स्तरों पर खुद को तैयार करने में खासी मशक्कत करते देखा जाता है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाले देशों के सामने मुश्किलें कुछ अधिक होती हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पैठ बना चुके और निरंतर विस्तारवादी रणनीति पर कायम रहने वाले विकसित देश उन्हें अस्थिर करने की चालें भी चलते रहते हैं। भारत उन देशों में अग्रणी है।

उसे न सिर्फ आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर, बल्कि सीमाओं पर भी निरंतर संघर्ष करते रहना पड़ता है। इसका बड़ा हिस्सा समुद्र से घिरा है, इसलिए समुद्री सीमा पर भी इसे उतनी ही मुस्तैदी बरतनी होती है, जितनी जमीनी सीमाओं पर। समुद्री सीमा में उसे मुख्य रूप से पाकिस्तान और चीन की सामरिक रणनीति पर नजर रखनी पड़ती है, पर अब श्रीलंका की तरफ से भी खतरे बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में समुद्री क्षेत्र में सामरिक शक्ति बढ़ाने की दरकार पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इसी के मद्देनजर रक्षा मंत्रालय ने देश के स्तर पर ही उच्च क्षमता वाली छह पनडुब्बियां बनाने के तिरालीस हजार करोड़ रुपए के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। उम्मीद की जा रही है कि इससे आने वाले सालों में समुद्री सुरक्षा को लेकर कुछ निश्चिंत हुआ जा सकता है।

इस प्रस्ताव को मिली मंजूरी की सबसे खास बात है कि इन पनडुब्बियों को देश में ही तैयार किया जाएगा। ये अत्याधुनिक तकनीक से लैस होंगी और दुश्मन के रडार को चकमा देने में सक्षम। भारत सरकार काफी समय से कोशिश कर रही है कि रक्षा सामग्री का अधिक से अधिक निर्माण और उत्पादन देश के स्तर पर ही हो। पहले ही लड़ाकू विमान और थल सेना के इस्तेमाल लायक अनेक हथियारों को देशी तकनीक से बनाने की मंजूरी दी जा चुकी है। अगले कुछ सालों में वे सब साजो-सामान सेना को मिलने शुरू हो जाएंगे। उसी कड़Þी में पनडुब्बी निर्माण को मंजूरी दी गई है। इससे एक तो विदेशी रक्षा उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर से निर्भरता कम होगी और अगर भारत ने रक्षा सामग्री निर्माण में अपनी क्षमता विकसित कर ली, तो वह दूसरे देशों को भी अत्याधुनिक तकनीक से लैस हथियार वगैरह बेच सकता है। जिस तरह उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में भारत ने विकसित देशों से प्रतिस्पर्द्धा करनी शुरू कर दी है, रक्षा उपकरण के क्षेत्र में भी वह क्षमता विकसित कर सकता है।

इसके अलावा, भारत को इस समय सबसे बड़ा खतरा चीन की विस्तारवादी नीति से है। वह न सिर्फ अपने से लगी सीमा पर भारत को चुनौती देता रहता है, बल्कि उसके पड़ोसी देशों को भी अपने पक्ष में करके उसे परेशान करने की कोशिश करता देखा जाता है। अब उसने कुछ सार्क देशों के भीतर भी अपनी पैठ बना ली है। पाकिस्तान को तो वह प्रत्यक्ष समर्थन देता ही रहा है, नेपाल और श्रीलंका में भी अपनी उपस्थिति बनानी शुरू कर दी है। नेपाल के जरिए वह कालापानी पर भारत के दावे को चुनौती दे रहा है, तो श्रीलंका में आर्थिक मदद के जरिए उसने कोलंबो पोर्ट पर अपना अधिकार जमा लिया है। यानी अब वहां से वह अपनी सामरिक गतिविधियां भी संचालित कर सकता है। कोलंबो पोर्ट भारत की समुद्री सीमा से बिल्कुल करीब है। इसलिए उस क्षेत्र में भारत को अपनी ताकत बढ़ानी ही होगी। नई पनडुब्बी परियोजना से निस्संदेह नौसेना की ताकत बढ़ेगी।

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