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संपादकीयः तेल की धार

पेट्रोल, डीजल और गैसों के दाम लगातार बढ़ने से स्वाभाविक ही विरोध के स्वर उभरने शुरू हो गए हैं। इस वक्त डीजल की कीमतें बहत्तर रुपए के ऊपर पहुंच गई हैं, जो अब तक के सबसे ऊपरी स्तर पर है।

पेट्रोल, डीजल और गैसों के दाम लगातार बढ़ने से स्वाभाविक ही विरोध के स्वर उभरने शुरू हो गए हैं। इस वक्त डीजल की कीमतें बहत्तर रुपए के ऊपर पहुंच गई हैं, जो अब तक के सबसे ऊपरी स्तर पर है। पेट्रोल का दाम अस्सी से सतासी रुपए के बीच हो गया है। पहले ही विपक्ष ने महंगाई के विरोध में भारत बंद का आह्वान किया था, रविवार को तेल की कीमतें बढ़ने से उसे सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है। अब राजग की सहयोगी शिव सेना भी विरोध में उतर आई है। हालांकि वित्तमंत्री ने महंगाई बढ़ने और अर्थव्यवस्था के डावांडोल होने से इंकार किया है। मगर यह तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा। हकीकत यह है कि राजग सरकार के साढ़े चार सालों में तेल की कीमतें लगातार बढ़ी हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के मुताबिक पेट्रोल-डीजल के दामों को नियंत्रित करने का प्रावधान है, पर जिन दिनों कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने सबसे निचले स्तर पर थीं, उन दिनों भी भारत में तेल की कीमतें नीचे नहीं आर्इं। इसलिए इसे लेकर लोगों की नाराजगी समझी जा सकती है।

तेल की कीमतें बढ़ने के पीछे बड़ा कारण डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत है। अब डॉलर की तुलना में रुपए की कीमत करीब बहत्तर रुपए तक पहुंच गई है। इस तरह सरकार को कच्चे तेल की अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। हालांकि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो सरकारें उत्पाद शुल्क घटा कर उपभोक्ता का बोझ कम करने की कोशिश करती हैं। कुछ महीने पहले जब इसी तरह तेल की बढ़ती कीमतों को लेकर विपक्ष का हमला तेज हुआ था, तो कुछ राज्य सरकारों ने उत्पाद शुल्क में कटौती करके उपभोक्ता को राहत देने का प्रयास किया था। उन दिनों चार विधानसभाओं में चुनाव होने वाले थे। पर फिर तेल की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं किया गया। यहां तक कि केंद्र सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में लगातार उत्पाद शुल्क बढ़ाया ही है। इस दौरान उत्पाद शुल्क बढ़ कर करीब दो गुना हो गया है। इसी तरह रसोई गैस और सीएनजी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। सामान्य उपभोक्ता को रसोई गैस की कीमत पहले की तुलना में डेढ़ गुना से अधिक चुकानी पड़ रही है।

स्पष्ट तथ्य है कि जब डीजल-पेट्रोल और र्इंधन गैसों की कीमत बढ़ती है, तो उसका सीधा असर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। यों संतुलित दर से महंगाई बढ़ना अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए अच्छा माना जाता है, पर जब वस्तुओं की कीमतें ढुलाई की वजह से बढ़ें तो यह संतुलित महंगाई नहीं कहलाती, क्योंकि उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचने में जो दाम बढ़ जाता है, उसका लाभ उत्पादक को नहीं मिलता। इस तरह वस्तुओं की मांग और उत्पादन की दर घटती है। जाहिर है, इसका असर विकास दर पर पड़ता है। राजग सरकार के शुरुआती दिनों में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपने सबसे निचले स्तर पर थीं, तब सरकार ने इस तर्क पर तेल की कीमतें नहीं घटाई और उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया कि जब तेल की कीमतों को संभालना मुश्किल होगा, तब इस पैसे का उपयोग किया जाएगा। मगर अब सरकार शायद उस वादे को भूल गई है। अगर समय रहते इस दिशा में व्यावहारिक कदम नहीं उठाए गए तो अर्थव्यवस्था को लक्षित दर तक पहुंचाना मुश्किल होगा।

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