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संपादकीय: लाख के करीब

अमेरिका में संक्रमितों पर जिस तरह से दवाओं के प्रयोग हो रहे हैं, वे ज्यादा हैरान करने वाले हैं। राष्ट्रपति ट्रंप का जोर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन पर है और वे खुद बचाव के तौर पर इसकी खुराक ले रहे हैं। जबकि बड़ी संख्या में अमेरिकी चिकित्सक और वैज्ञानिक इस दवा के प्रयोग के सख्त खिलाफ हैं।

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अमेरिका में कोरोना महामारी से मरने वालों का आंकड़ा एक लाख के करीब पहुंच चुका है। संक्रमितों की तादाद सोलह लाख के ऊपर है। हालांकि ये भारी-भरकम आंकड़े हैरानी इसलिए पैदा नहीं करते क्योंकि दो महीने पहले ही वाइट हाउस के स्वास्थ्य संबंधी मामलों के सलाहकार डा. एंथनी स्टीफन फॉसी ने साफ कहा था कि अगर मृतकों की संख्या एक-सवा लाख पर आकर रुक जाती है तो यह बड़ी उपलब्धि होगी।

ऐसे में अमेरिका के लिए एक लाख लोगों का कोविड-19 से मारा जाना कोई बड़ी बात नहीं है, बल्कि बड़ी बात यह कि कोरोना महामारी को अमेरिका ने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया है। दुनिया में अमेरिका ही उन कुछ देशों में से है जिसने बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों की कोविड जांच का अभियान चलाया। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि लोगों को वक्त पर सही इलाज मिल रहा है।

लेकिन एक लाख लोगों की मौतों का आंकड़ा दुनिया को परेशान इसलिए कर रहा है कि अमेरिका जैसे सर्वाधिक शक्तिशाली देश में इतने ज्यादा लोगों की मौत ! अमेरिका के इतिहास में अब तक किसी बीमारी या किसी भी कारण से इतनी बड़ी संख्या में लोग नहीं मरे। जिस तरह से संक्रमितों की तादाद अचानक बढ़ी, उस अनुपात में वेंटीलेटर जैसे जरूरी चिकित्सकीय उपकरण, पीपीई किट आदि की भारी कमी लोगों की मौत का कारण बनी। अभी भी समस्या यह है कि किसी के पास कोई दवा नहीं है।

हर देश तरह-तरह की दवाओं को आजमा कर देख रहा है। अमेरिका में संक्रमितों पर जिस तरह से दवाओं के प्रयोग हो रहे हैं, वे ज्यादा हैरान करने वाले हैं। राष्ट्रपति ट्रंप का जोर हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन पर है और वे खुद बचाव के तौर पर इसकी खुराक ले रहे हैं। जबकि बड़ी संख्या में अमेरिकी चिकित्सक और वैज्ञानिक इस दवा के प्रयोग के सख्त खिलाफ हैं।

वैज्ञानिकों की राय में यह दवा नुकसान ज्यादा कर रही है। इसीलिए अमेरिका में ज्यादातर मौतों के पीछे बड़ा कारण इस तरह की दवा के प्रयोगों को भी बताया जा रहा है। हालांकि दवा की खोज और परीक्षण का काम भी सबसे ज्यादा अमेरिका में ही चल रहा है, इसलिए सारी दुनिया अमेरिका की ओर टकटकी लगाए बैठी है कि कब वह इसका टीका बनाए और दुनिया को बचाए।

अमेरिका में कोरोना संक्रमण फैलने का बड़ा कारण पिछले साल नवंबर से मार्च तक साढ़े चार लाख लोगों का चीन से अमेरिका पहुंचना रहा है। लेकिन चीन के हालात देखते हुए भी अमेरिकी प्रशासन ने चीन से आने वाले यात्रियों पर कोई रोक नहीं लगाई। अमेरिका की अर्थव्यवस्था कहीं बैठ न जाए, इस डर के मारे ट्रंप ने देश में पूर्णबंदी जैसा कोई कदम नहीं उठाया।

जब स्पेन और इटली जैसे यूरोपीय देशों में कोरोना चरम रूप धारण कर चुका था, तब तक भी अमेरिका ने कोरोना महामारी को गंभीरता से नहीं लिया था। अमेरिकी नागरिक खुद पूर्णबंदी और सुरक्षित दूरी जैसे उपायों की धजिज्यां उड़ाते दिख रहे हैं। कई मौकों पर राष्ट्रपति ट्रंप तक मास्क नहीं लगाते नजर आते। अमेरिका में भले हालात कितने गंभीर क्यों न हों, लेकिन देश की जनता का मनोबल बढ़ाने के लिए ट्रंप जिस तरह से अपने को सार्वजनिक रूप से पेश करते हैं, वह भी कम चौंकाने वाला नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अमेरिका का संकट कहीं ज्यादा भयावह है, वरना लाख से ज्यादा लोगों की मौत ऐसे ही थोड़े होती।

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