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संपादकीय: बड़ा संकट

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कोई खतरा खड़ा न हो, इसी डर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने यहां लॉकडाउन यानी पूर्ण बंदी जैसा कदम नहीं उठाया और इसकी कीमत अमेरिका को अब अपने नागरिकों की जान के रूप में चुकानी पड़ रही है। करीब ढाई लाख अमेरिकी इस महामारी की जद में हैं। जबकि ज्यादातर यूरोपीय देशों ने अपने यहां पहले ही पूर्ण बंदी लागू कर दी थी।

Author Published on: April 6, 2020 12:09 AM
कोरोना का प्रकोप मानवता के लिए ऐतिहासिक तो है ही, इसके कारण और भी कई इतिहास बनेंगे और परंपराएं टूटेंगी।

पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना महामारी से जूझ रही है। लगभग सभी देशों के सामने इस वक्त जहां पहली और बड़ी चुनौती लोगों को मरने से बचाने और महामारी का प्रकोप खत्म करने की है, वहीं अर्थव्यवस्था को बचाए रखने का संकट भी मामूली नहीं है। यों दुनिया में पिछले कुछ समय से आर्थिक सुस्ती का दौर तो चल रहा था, लेकिन तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यह महामारी अचानक से दस्तक देगी और सब कुछ ठप करके रख देगी। पिछले दो महीने में एशिया, यूरोप और अमेरिका के बाजारों का जो हाल हुआ है, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की हालत बताने के लिए काफी है।

इटली, स्पेन, ब्रिटेन, जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों और अमेरिका में कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों का बढ़ता आंकड़ा तो चिंता पैदा कर ही रहा है, दूसरी ओर इन देशों में व्यापारिक गतिविधियां बंद-सी हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि लाखों लोगों नौकरियां चली गई हैं। गुजारा करने के लिए पैसे नहीं हैं। इटली में तो लूटपाट की घटनाएं भी हो रही हैं। पिछले दिनों जर्मनी के हेस प्रांत के वित्त मंत्री ने इसी चिंता में खुदकुशी कर ली थी कि कोरोना से जर्मनी की अर्थव्यवस्था जिस तरह से लड़खड़ा गई है, उससे उबरने के रास्ते नजर नहीं आ रहे थे। शायद ही पहले कभी ऐसा हुआ जो जब किसी देश के वित्त मंत्री ने देश की ढहती अर्थव्यवस्था के सदमे में ऐसा आत्मघाती कदम उठाया हो।

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर कोई खतरा खड़ा न हो, इसी डर से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने यहां लॉकडाउन यानी पूर्ण बंदी जैसा कदम नहीं उठाया और इसकी कीमत अमेरिका को अब अपने नागरिकों की जान के रूप में चुकानी पड़ रही है। करीब ढाई लाख अमेरिकी इस महामारी की जद में हैं। जबकि ज्यादातर यूरोपीय देशों ने अपने यहां पहले ही पूर्ण बंदी लागू कर दी थी।

माना जा रहा है कि कोरोना संकट से यूरोप की अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट का दौर लंबे समय तक बना रह सकता है और इसमें करीब तीस फीसद तक की कमी देखने को मिल सकती है। अभी ज्यादातर देशों के बीच कारोबारी गतिविधियां ठप हैं। सिर्फ जरूरी सामान को छोड़ कर सभी कारखाने बंद है। बैंकों पर भी इसका असर पड़ा है। जाहिर है, सारे देशों की प्राथमिकता पहले महामारी से मुकाबला करना है।

अर्थव्यवस्था को लेकर भारत की दशा भी कोई ज्यादा अच्छी नहीं है। भारत डेढ़-दो साल से आर्थिक सुस्ती का सामना कर ही रहा था। लेकिन अब कोरोना का संकट आ खड़ा हुआ और इससे निपटने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर आर्थिक और वित्तीय संसाधन झोंकने पड़े हैं। यह अचानक आए किसी बड़े खर्च की तरह है जो किसी का भी बजट बिगाड़ सकता है।

हाल में रेटिंग एजेंसी फिच ने भारतीय अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट की बात कही थी। लेकिन एशियाई विकास बैंक का मानना है कि भारत जल्द ही संकट से निकल जाएगा और इस साल विकास दर भले चार फीसद रहे, पर अगले साल यह छह फीसद तक पहुंच सकती है। फौरी संकट यह है पूर्ण बंदी की वजह से ज्यादातर उत्पादन केंद्र यानी कारखाने बंद करने पड़े हैं। छोटे और मझोले उद्योगों के बंद होने से लोगों के सामने आजीविका का संकट भी खड़ा हो गया है। लेकिन कोरोना संकट को देखते हुए ऐसा फैसला जरूरी भी था, वरना अमेरिका जैसे दिन देखने पड़ जाते!

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