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संपादकीय: मंदी की मार

छोटे और मझोले कारोबार बुनियादी रूप से नगदी के प्रवाह पर टिके होते हैं, ऐसे में नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार इन्हीं पर पड़ी। नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में काम-धंधे बंद हो गए और बाजार में नगदी का प्रवाह टूट गया, जिसका आज तक असर बना हुआ है।

Author Published on: June 1, 2020 1:09 AM
देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए और बदलाव करने की जरूरत है।

सरकार ने शुक्रवार को जीडीपी के जो ताजा आंकड़े जारी किए, वे बता रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था बदतर हाल में पहुंच चुकी है। पिछले वित्त वर्ष यानी 2019-20 में आर्थिक विकास दर सिमटती हुई 4.2 फीसद पर आ गई है, जबकि अनुमान पांच फीसद का था। जाहिर है, पूरे साल अर्थव्यवस्था पर मंदी का जो साया बना रहा, यह उसी का प्रतिफल है। कृषि क्षेत्र को छोड़ दें तो अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों जैसे विनिर्माण, निर्माण, बिजली, इस्पात, सेवा क्षेत्र आदि की हवा खराब है। पिछले ग्यारह साल में पहली बार ऐसा हुआ है जब आर्थिक विकास दर इतनी नीचे आ गई है।

राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय के आंकड़े ज्यादा चौंकाने वाले इसलिए भी हैं क्योंकि 2019-20 की अंतिम तिमाही यानी जनवरी-मार्च 2020 में विकास दर मात्र 3.1 फीसद रही, जबकि सरकार का अनुमान 4.7 फीसद का था। अनुमान और परिणाम में यह भारी अंतर इसलिए है कि अनुमान लगाते समय हकीकत और व्यावहारिक स्थितियों के आकलन को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले डेढ़-दो साल से ज्यादा मुश्किलों का सामना कर रही है और दिनोंदिन यह समस्या गहराती जा रही है। अर्थव्यवस्था में मंदी के दौर पहले भी आते रहे हैं, लेकिन जो झटका आठ नवंबर 2016 को देश में एक हजार और पांच सौ रुपए के नोटों को गैरकानूनी घोषित करने के फैसले ने दिया, उसने अर्थव्यवस्था को भारी चोट पहुंचाई। मौजूदा हालात की जड़ें इसी में हैं। पिछली आठ तिमाहियों से अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट भी इसकी पुष्टि करती है।

छोटे और मझोले कारोबार बुनियादी रूप से नगदी के प्रवाह पर टिके होते हैं, ऐसे में नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार इन्हीं पर पड़ी। नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में काम-धंधे बंद हो गए और बाजार में नगदी का प्रवाह टूट गया, जिसका आज तक असर बना हुआ है। इसी के साथ देश में नई कर व्यवस्था यानी जीएसटी भी लागू कर दिए जाने के बाद कारोबार पर जो असर पड़ा है, वह किसी से छिपा नहीं है। जीएसटी की व्यवस्था को जिस मानमाने तरीके से थोपा गया, उसका असर सरकार के कर राजस्व संग्रह पर भी पड़ा। समस्या यह है कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्थाओं में आमूलचूल परिवर्तन के लिए कदम उठाते वक्त जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया जाता है और फिर इसके दुष्परिणाम देखने को मिलते हैं। नोटबंदी और जीएसटी का मिलाजुला असर गिरती आर्थिक विकास दर के रूप में सामने आ रहा है।

आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए पिछले साल सरकार ने समय-समय पर कई कदम उठाए, लेकिन सब बेअसर साबित हुए। अब देश कोरोना संकट से जूझ रहा है और अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं है। दो महीने की पूर्णबंदी से उद्योग-धंधे चौपट हो गए हैं, करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए हैं और इस कारण लोगों के पास पैसा खत्म हो गया है।

प्रवासी मजदूरों को जिस तरह घर लौटने को मजबूर होना पड़ रहा है, उसका असर आने वाले वक्त में उत्पादन पर पड़ना तय है। अभी सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था के चक्र को चलाने के लिए रोजगार पैदा कर आय बढ़ाने, मांग पैदा करने और उत्पादन शुरू करने की है। अर्थव्यवस्था को गति देने में बैंक भी बहुत ज्यादा सक्षम साबित नहीं हो रहे हैं। सरकार के आर्थिक पैकेज कितने कारगर रहेंगे, कहा नहीं जा सकता। ऐसे में अगली बार विकास दर का आंकड़ा क्या होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

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