ताज़ा खबर
 

संपादकीय: गरीबी की दलदल

दरअसल, महामारी से लड़ने के लिए लागू पूर्णबंदी की मार लगभग सभी क्षेत्रों पर पड़ी, लेकिन इन मानकों के लिहाज से देखें तो इसका सबसे ज्यादा शिकार गरीब तबकों को ही होना पड़ा। स्कूल बंद होने से पढ़ाई का एकमात्र आसरा बंद हुआ, परिवार में आमदनी का जरिया रुक जाने से न्यूनतम पोषण से वंचित और बीमार होने के हालात पैदा हुए।

unemployed, unemployed in India, due to lockdown, कोरोना काल में भारत में सबसे ज्यादा रोजगार निजी क्षेत्र में गया है।

वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी से लड़ने के लिए बहुत सारे देशों में पूर्णबंदी को सख्ती से अमल में लाया गया। इससे संक्रमण को रोकने में कितनी मदद मिली, इसका आकलन आना अभी बाकी है। लेकिन इसकी वजह से जो दूसरे घातक परिणाम सामने आ रहे हैं, उससे लड़ने में दुनिया को शायद ज्यादा मशक्कत करनी पड़ेगी। यूनिसेफ और सेव द चिल्ड्रेन की ओर से प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना की वजह से खड़े हुए संकट ने पंद्रह करोड़ से ज्यादा बच्चों को गरीबी की दलदल में धकेल दिया है।

रिपोर्ट के मुताबिक महामारी और उसके चलते लगाई गई पूर्णबंदी की वजह से कम और मध्यम आय वाले देशों में गरीबी में रहने वाले बच्चों की संख्या बढ़ कर एक अरब बीस करोड़ हो गई है। गरीबी को लेकर दुनिया भर में जो एक तरह की उदासीनता रही है, उसमें शायद पंद्रह करोड़ और बच्चों के आंकड़े में जुड़ने को भी बहुत गंभीरता से नहीं देखा जाए। मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि यह नई बनती स्थिति मानवता के सामने गंभीर संकट की वजह बन सकती है।

यों महामारी के पहले आम स्थितियों में भी गरीब तबकों के लोगों को किसी तरह जिंदा रहने के लिए जद्दोजहद ही करना पड़ता रहा है। अधिकार और सम्मान जैसी स्थितियां उनके लिए सपने जैसी बातें रही हैं। लेकिन किसी तरह वे अपनी जिंदगी की गाड़ी चला रहे थे। बीच में गुंजाइश निकाल कर उनमें से कई परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने की कोशिश भी कर रहे थे। लेकिन पूर्णबंदी के दौरान जब रोजी-रोटी के सारे उपाय खत्म हो गए तो ऐसे में न्यूनतम जरूरतों को पूरा करना भी मुहाल हो गया।

इसे यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक ने भी स्वीकार किया है कि जो परिवार गरीबी से निकलने के मुहाने पर खड़े थे, उन्हें वापस खींच लिया गया है; दूसरे लोग ऐसी तंगी और परेशानियां झेल रहे हैं, जो उन्होंने कभी नहीं देखीं। यूनिसेफ और सेव द चिल्ड्रेन की ताजा रिपोर्ट में बच्चों के गरीबी के दलदल में और गहरे धंसा देने के जो कारण बताए गए हैं, उनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, देखभाल और रहने की जगह न मिलने को भी आधार बनाया गया है।

दरअसल, महामारी से लड़ने के लिए लागू पूर्णबंदी की मार लगभग सभी क्षेत्रों पर पड़ी, लेकिन इन मानकों के लिहाज से देखें तो इसका सबसे ज्यादा शिकार गरीब तबकों को ही होना पड़ा। स्कूल बंद होने से पढ़ाई का एकमात्र आसरा बंद हुआ, परिवार में आमदनी का जरिया रुक जाने से न्यूनतम पोषण से वंचित और बीमार होने के हालात पैदा हुए, देखभाल में उदासीनता स्वाभाविक नतीजा रही और पूर्णबंदी ने इनके अस्थायी तौर पर टिकने की जगह को भी आमतौर पर छीन लिया। स्कूलों के बंद होने की हालत में फिलहाल जो आॅनलाइन पढ़ाई का विकल्प पेश किया गया है, वह संसाधनों और प्रशिक्षण के अभाव में गरीब तबकों को ही शिक्षा के दायरे से बाहर करेगा।

इसका सीधा असर गरीबी में जीवन गुजारने वाले बच्चों की दशा और ज्यादा खराब होने के रूप में सामने आएगा। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल से एक खबर आई कि वहां पूर्णबंदी की वजह से उपजे हालात में बाल मजदूरों की तादाद में एक सौ पांच फीसद की बढ़ोतरी हो गई, लड़कियों की स्थिति और ज्यादा खराब है। गरीबी अपने आप में कई गंभीर बीमारियों की वजह है। लेकिन जब कोई बीमारी गरीबी के दायरे का और ज्यादा विस्तार करती है या उसे बढ़ाती है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक बीमारी के साथ कितनी और बीमारियां किसी भी देश और समाज को समस्या के किस गर्त में धकेल सकती हैं!

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: चीन को दो टूक
2 संपादकीयः आशंका बनाम सुधार
3 संपादकीयः सांसत में श्रमिक
ये पढ़ा क्या?
X