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संपादकीय: विस्थापन का दर्द

सिर पर गठरी, तो गोद में छोटे-छोटे बच्चे लादे भूखे-प्यासे किसी तरह अपने गांव लौटने का प्रयास करते लोग। पुलिस उन्हें लौटाने का प्रयास करती रही। कहीं-कहीं उन्हें दंडित भी किया गया। कुछ पर डंडे चले, तो कुछ को मुर्गा बना कर चलाया गया। पुलिस को शायद स्पष्ट निर्देश नहीं था कि इन लोगों के साथ कैसा सलूक करना है।

Author Published on: March 30, 2020 2:14 AM
कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान जरूरी चीजों की सप्लाई भी हुई बाधित। (एक्सप्रेस फोटो)

पूर्ण बंदी के इस माहौल में महानगरों से अपने गांवों की तरफ लौटते लोगों का हुजूम कई तरह की चिंता पैदा कर रहा है। सरकार ने कोरोना विषाणु का चक्र तोड़ने के मकसद से देशव्यापी पूर्ण बंदी की घोषणा की। माना जा रहा था कि इससे लोग अपने घरों में बंद रहेंगे और संक्रमण का दायरा नहीं बढ़ेगा। मगर पहले बंदी की घोषणा के तुरंत बाद जिस तरह राशन-पानी जुटाने के लिए लोगों में अफरा-तफरी मच गई, उससे बंदी का मकसद धुंधला पड़ने लगा था। फिर रात के अंधेरे में लोग दिल्ली और आसपास के औद्योगिक नगरों से पैदल चलते हुए अपने गांव वापस लौटने लगे। पहले दिन कुछ कम और फिर उसके बाद रोज इस तरह लौटने वालों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी होने लगी। दिन-रात सड़कों पर चलते लोगों का तांता नजर आने लगा।

सिर पर गठरी, तो गोद में छोटे-छोटे बच्चे लादे भूखे-प्यासे किसी तरह अपने गांव लौटने का प्रयास करते लोग। पुलिस उन्हें लौटाने का प्रयास करती रही। कहीं-कहीं उन्हें दंडित भी किया गया। कुछ पर डंडे चले, तो कुछ को मुर्गा बना कर चलाया गया। पुलिस को शायद स्पष्ट निर्देश नहीं था कि इन लोगों के साथ कैसा सलूक करना है। वह सिर्फ किसी तरह उन्हें अपने ठीयों पर वापस भेज कर सुरक्षा चक्र को कायम करना चाहती थी। मगर तमाम दुश्वारियों के बाद भी लोगों का वापस लौटने का सिलसिला रुका नहीं।

इस तरह अपने गांव लौटने वाल लोग दिहाड़ी मजदूर, साप्ताहिक बाजारों और सड़कों के किनारे रेहड़ी लगाने वाले, लघु और मंझोले कारखानों में छोटे-मोटे काम करने, रिक्शा खींचने, माल ढुलाई आदि करने वाले हैं। बंदी के बाद बाजार और कल-कारखाने बंद हो गए हैं। घरों में झाड़ू-पोंछा करके गुजारा करने तक का आसरा छिन गया है। बंदी कब खुलेगी और फिर कब तक जिंदगी सामान्य रफ्तार में लौटेगी, रोजगार के अवसर कब खुलेंगे, फिर लोगों को अपना खोया रोजगार मिल पाएगा कि नहीं, यह सब कुछ अनिश्चित है। ये लोग बेहतर जिंदगी की आस लिए गांवों से पलायन कर महानगरों में आए थे, अब इसका कोई जरिया उनके पास नहीं है। सो, इन्हें बीमारी से ज्यादा चिंता बसर करने की है।

कमाई नहीं होगी, तो खाएंगे क्या, उनके सामने यह सवाल सबसे बड़ा है। उन्हें भरोसा है कि गांव पहुंच कर कम से कम भुखमरी और महानगरीय यंत्रणा का शिकार तो नहीं बनेंगे। इसलिए वे किसी तरह अपने गांव, अपने परिवार के बीच पहुंच जाना चाहते हैं।

इस तरह गांव से उजड़ कर शहर आए और फिर शहर से उजड़ कर गांव लौट रहे लोगों के विस्थापन का दर्द अभी कोई भी सरकार संजीदगी से महसूस कर पाती नहीं दिख रही। दिल्ली सरकार ने कुछ रैन बसेरे जरूर खोल दिए हैं, कुछ खाने-पीने की भी व्यवस्था की है, कुछ स्वयंसेवी लोग भी आगे आते दिखे हैं, पर ये प्रयास किसी भी तरह काफी नहीं हैं।

तमाम यातनाएं सह कर भी अपने वतन वापस लौटने की जिद पर अड़े लोगों की खबरें मीडिया में आनी शुरू हुईं, तो दिल्ली से सटे राज्यों की सरकारों ने कुछ बसें चलाने का उपक्रम किया, मगर लाखों लोगों की सकुशल वापसी उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुकी है। सरकारों को शायद इस स्थिति का अंदाजा नहीं था। अब भी उनका जोर वापस लौटते लोगों को रोकने पर अधिक है। आर्थिक पैकेज और नकदी सहायता पहुंचाने से बड़ी जरूरत इन लोगों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाना है।

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