ताज़ा खबर
 

संपादकीय: मंदी का दुश्चक्र

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था शून्य से पांच फीसद नीचे जा सकती है। ऐसा हुआ तो आने वाले तीन-चार साल तक भारत इस संकट से उबर नहीं पाएगा।

Author Published on: May 28, 2020 4:07 AM
अर्थशास्त्रियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी का संकेत दिया है।

भारत की अर्थव्यवस्था एक बार फिर भयंकर मंदी के दुश्चक्र में फंस गई है। हालात की गंभीरता बता रही है कि आने वाला वक्त और संकटपूर्ण होगा। इस वक्त जिस तरह के हालात बन गए हैं, उनसे निपटने में केंद्र और राज्य सरकारों के हाथ-पैर फूल रहे हैं। अर्थशास्त्री परेशान हैं, कुछ सूझ नहीं रहा कि मंदी से कैसे निकला जाए। हालांकि पिछले पांच महीनों में रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार ने पैकेज घोषित तो किए हैं, लेकिन वे इस वक्त ऊंट के मुंह में जीरे से ज्यादा साबित हो नहीं रहे।

इस बार क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने जो आकलन व्यक्त किया है, उसके मुताबिक चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था शून्य से पांच फीसद नीचे जा सकती है। अगर ऐसा हुआ, जैसे कि हालात दिख भी रहे हैं, तो आने वाले तीन-चार साल तक भारत इस संकट से उबर नहीं पाएगा। इससे पहले फिच और मूडीज का आकलन भी कमोबेश यही रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले दो महीने के दौरान देश में पूर्णबंदी जारी रहने से अर्थव्यवस्था को भारी धक्का पहुंचा है। किसी भी देश में अगर दो महीने तक औद्योगिक गतिविधियों को एकदम ठप कर दिया जाए तो इससे होने वाले नुकसान का आकलन कर पाना कठिन नहीं है। उसके गंभीर नतीजे ही बताते हैं कि क्या से क्या हो गया।

भारत में पूर्णबंदी के दौरान रेल, हवाई सेवाएं, सभी तरह के सार्वजनिक और निजी परिवहन सब बंद रहे। कोयला, बिजली, पेट्रोलियम, सीमेंट जैसे प्रमुख क्षेत्रों में उत्पादन ठहर गया। रियल एस्टेट से लेकर सारे छोटे-बड़े कारखाने, फैक्ट्रियों में कोई काम नहीं हुआ, यानी जरूरी सेवाओं को छोड़ कर कहीं कोई उत्पादन नहीं हुआ। इसका दूसरा खौफनाक पक्ष यह रहा कि काम बंद होते ही ज्यादातर नियोक्ताओं ने कामगारों की छुट्टी कर दी। संगठित क्षेत्र में छंटनी और भारी वेतन कटौती का दौर जारी है। जबकि पूर्णबंदी का ऐलान करते वक्त प्रधानमंत्री ने नियोक्ताओं से ऐसा नहीं करने की अपील की थी। असंगठित क्षेत्र के कामगारों की दुर्दशा पूरी दुनिया देख रही है।

भले कहा जा रहा हो कि हालात कोविड-19 की वजह से खराब हुए हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में आर्थिक गिरावट का दौर पिछले दो साल से बना हुआ है। पूर्णबंदी की वजह से तो पर्यटन, नागरिक उड्डयन, मनोरंजन, रियल एस्टेट, आटो मोबाइल उद्योग जैसे कई प्रमुख क्षेत्र जो बड़े पैमाने पर रोजगार देते हैं, लड़खड़ा गए हैं। सरकार कह रही है कि छोटे और मझौले उद्योगों को बिना किसी गारंटी के कर्ज दिया जाएगा। बाजार में पैसा डालने के लिए रिजर्व बैंक बार-बार रेपो और रिवर्स रेपो दर में कटौती कर रहा है, ताकि बैंक कर्ज और सस्ता करें। लेकिन कर्ज लेने वाले नहीं हैं। सब अनिश्चितता के खौफ से घिरे हैं।

बैंक कर्ज सस्ता होने का एक असर यह भी पड़ रहा है कि सावधि जमा पर भी ब्याज दरें काफी गिर गई हैं। ऐसे में जिन लोगों की आमद का एकमात्र साधन बैंक में जमा रकम से अर्जित ब्याज होता है, उनके सामने भी मुश्तकिलें खड़ी होने लगी हैं। मंदी की मार चौतरफा है। राज्य सरकारों का राजकोषीय घाटा तेजी से बढ़ रहा है। अर्थशास्त्रियों की ओर से सुझाव यह भी आ रहे हैं कि सरकार को राजकोषीय घाटे की चिंता छोड़ मौद्रीकरण के रास्ते पर चलना चाहिए। बेहतर हो कि अब सरकार दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर प्रमुख अर्थशास्त्रियों की टीम बनाए और मंदी से निकलने के लिए जो उपाय बताए जाएं, उन पर ईमानदारी से काम हो।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: अव्यवस्था की उड़ान
2 संपादकीय: चीन की चाल
3 संपादकीय: लाख के करीब