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संपादकीय: उद्यमियों का संकट

पूर्णबंदी की वजह से करोड़ों लोगों का रोजगार छिन गया है। इसका असर यह हुआ है कि लोगों के पास पैसा नहीं है। मध्यवर्ग की हालत और खराब है। ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जिन्होंने घर, गाड़ी और अन्य जरूरतों के लिए पहले से बैंक कर्ज ले रखे हैं। पर अब पैसा न होने से कर्ज की किस्तें चुकाना भारी पड़ रहा है।

देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए और बदलाव करने की जरूरत है।

कुटीर, लघु और मझोले उद्योगों को संकट से निकालने के लिए हाल में सरकार ने बीस हजार करोड़ रुपए की कर्ज संबंधी मदद और पचास हजार करोड़ रुपए की इक्विटी पूंजी डालने का एक और बड़ा कदम उठाया है। बीस हजार करोड़ रुपए की मदद उन उद्योगों को दी जाएगी जो कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं। साथ ही, एमएसएमई को नए सिरे से परिभाषित करते हुए और रियायतें दी हैं। इससे उद्योगों के कारोबार का दायरा बढ़ेगा और उसके अनुरूप उन्हें और रियायतें भी मिलेंगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पूर्णबंदी के कारण छोटे उद्योग पूरी तरह से ठप हो गए हैं। इनकी संख्या लाखों में है।

चिंता का विषय यह है कि देश की बड़ी आबादी की रोजी-रोटी इन छोटे उद्योगों पर ही टिकी है। देश की जीडीपी में इनका योगदान भी कम नहीं है। छोटे उद्योग घरेलू जरूरतें तो पूरी करते ही हैं, ये बड़े उद्योगों की रीढ़ भी हैं। इसके अलावा निर्यात में इनकी भागीदारी महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में अगर ये उद्योग चालू नहीं हो पाएंगे तो अर्थव्यवस्था का पटरी पर आ पाना मुश्किल है।

सरकार और रिजर्व बैंक ने एमएसएमई क्षेत्र के लिए पिछले दो महीने में कई योजनाएं पेश की हैं। लेकिन व्यावहारिक समस्याएं इतनी पेचीदा हैं कि ये उद्योग कैसे उत्पादन शुरू करें, किसी की समझ में नहीं आ रहा। इन्हें फिर से खड़ा करना सरकार और बैंकों के लिए एक बड़ी चुनौती है। अभी उद्यमियों के सामने सबसे बड़ी समस्या पैसे और कामगारों की है। लाखों कामगार अपने घरों को लौट चुके हैं। उद्योगों को फिर से काम शुरू करने के लिए जितनी बड़ी पूंजी चाहिए, वह है नहीं। कर्मचारियों के वेतन, इकाई के बिजली बिल और अन्य खर्चों के अलावा कच्चे माल की खरीद के लिए भी पैसा चाहिए।

कहने को सरकार ने तीन लाख करोड़ की कर्ज गारंटी योजना शुरू की है, लेकिन यह है तो कर्ज ही। अधिकतर उद्यमी पहले से ही भारी कर्ज में डूबे हैं। ऐसे में वे और कर्ज लेने का जोखिम कैसे उठाएं, यह बड़ा सवाल है। सरकार की जितनी भी योजनाएं हैं, वे सारी कर्ज योजनाएं हैं, भले बहुत ही कम ब्याज या बिना ब्याज का कर्ज ही क्यों न हो, या भारी रियायतें क्यों न मिलें, लेकिन यह मदद है तो कर्ज ही। एक मोटे अनुमान के अनुसार छोटे उद्योगों पर बैंकों का दस लाख करोड़ रुपए बकाया है। ऐसे में यह क्षेत्र अब और कर्ज लेकर पूरी तरह से डूब जाने का खतरा नहीं उठा सकता। बेहतर होता कि सरकार इस क्षेत्र के लिए कर्ज के बजाय किसी पैकेज विशेष का एलान करती, जिससे उद्यमियों पर कर्ज लौटाने का दबाव नहीं रहता।

पूर्णबंदी की वजह से करोड़ों लोगों का रोजगार छिन गया है। इसका असर यह हुआ है कि लोगों के पास पैसा नहीं है। मध्यवर्ग की हालत और खराब है। ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है जिन्होंने घर, गाड़ी और अन्य जरूरतों के लिए पहले से बैंक कर्ज ले रखे हैं। पर अब पैसा न होने से कर्ज की किस्तें चुकाना भारी पड़ रहा है। लोगों के पास पैसा न होने से बाजार ठंडे पड़े हैं। उद्यमियों के सामने बड़ा संकट यह है कि वे उत्पादन करेंगे और मांग नहीं होगी तो माल कहां खपाएंगे। ऐसे में उद्योगों को कर्ज के सहारे उबारने के अलावा और क्या विकल्प हो सकता है, इस पर गौर करने की जरूरत है।

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