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संपादकीयः पाक का पैंतरा

नई सरकार के गठन पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को भारत के प्रधानमंत्री ने बधाई दी और दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्तों की उम्मीद जताई। यह भारत के सकारात्मक और शिष्टाचारपूर्ण रुख का परिचायक है।

Author August 22, 2018 5:03 AM
भारत ने पाकिस्तान की नई सरकार को बधाई मात्र भेजी है और स्पष्ट रूप से बताया कि भारत क्या चाहता है, पड़ोसी देश से क्या उम्मीद रखता है, दोनों देश मिल कर क्या कुछ ऐसा कर सकते हैं जिसमें दोनों की जनता के कल्याण की बात हो।

नई सरकार के गठन पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को भारत के प्रधानमंत्री ने बधाई दी और दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्तों की उम्मीद जताई। यह भारत के सकारात्मक और शिष्टाचारपूर्ण रुख का परिचायक है। इसे दोनों देशों के बीच रिश्तों में भारत की ओर से नई पहल कहा जाना चाहिए। लेकिन सवाल है कि पाकिस्तान इस पर कितना गंभीर है। दरअसल, पाकिस्तान के रुख का आभास तब मिला जब भारत के प्रधानमंत्री की ओर से भेजे गए बधाई पत्र पर पाकिस्तान ने एक अनावश्यक विवाद-सा खड़ा कर दिया। इस बधाई पत्र को पाकिस्तान के नए विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने ‘भारत की ओर से बातचीत की पेशकश’ करार दे डाला। लेकिन जब भारत ने इस पर आपत्ति की तो पाकिस्तान सरकार सतर्क हुई और उसने विदेश मंत्री के बयान पर तत्काल सफाई देते हुए अपना बचाव किया। पाकिस्तान सरकार ने कहा कि विदेश मंत्री कुरैशी के कहने का मतलब यह था कि ‘भारत के प्रधानमंत्री ने रचनात्मक शुरुआत की बात कही है’। लेकिन सवाल है कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने वाकई ऐसा कहा तो क्यों? क्या इसे जुबान फिसलना माना जाए या फिर उनके बयान के अर्थ को समझने में कोई चूक हुई और गलत भाव देते हुए मीडिया में चला दिया गया। जो भी हुआ, उसे एक अच्छी शुरुआत शायद नहीं कहा जा सकता।

भारत ने पाकिस्तान की नई सरकार को बधाई मात्र भेजी है और स्पष्ट रूप से बताया कि भारत क्या चाहता है, पड़ोसी देश से क्या उम्मीद रखता है, दोनों देश मिल कर क्या कुछ ऐसा कर सकते हैं जिसमें दोनों की जनता के कल्याण की बात हो। इससे पहले भारत के प्रधानमंत्री ने इमरान खान को फोन पर भी बधाई दी थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने तो शपथ लेने से पहले ही खुलकर कहा था कि अगर भारत शांति के लिए एक कदम बढ़ता है तो पाकिस्तान दो कदम बढ़ेगा। ऐसे में उनके बयान को क्या बातचीत की पेशकश समझा जाता? जीत के बाद अपने भाषण में जो सदाशयता और सकारात्मक रुख इमरान खान ने दिखाया था, वही भाव और मकसद भारत के प्रधानमंत्री के बधाई संदेश का है। ऐसे में इसे सीधे ही ‘भारत की ओर से बातचीत की पेशकश’ बताने की जरूरत फिलहाल नहीं थी। पड़ोसी देश को यह समझना चाहिए कि नाजुक मसलों पर इस तरह की बिना सोचे-समझे बयानबाजी कूटनीतिक हलकों में भ्रम पैदा कर सकती है। बधाई संदेश में साफ मंशा जाहिर करने और बातचीत का प्रस्ताव रखने में बुनियादी अंतर है। पाकिस्तान सरकार के विदेश मंत्री से ऐसे बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती जिस पर खुद उनकी सरकार को सफाई देनी पड़े।

भारत ने पाकिस्तान के साथ आपसी मसलों को हल करने में हमेशा से सकारात्मक रुख ही दिखाया है। इमरान खान की सरकार के बारे में शुरुआती दौर में ही यह धारणा बनी है कि यह सेना की मदद से बनी है। इसलिए बिना सेना के इशारे इसका चल पाना मुश्किल है। जाहिर है, इमरान खान के सामने चुनौतियां बड़ी और गंभीर हैं। चुनाव में जीत के बाद उन्होंने जो भाषण दिया था, उसमें कश्मीर का नाम लिए बिना उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान भारत से रिश्ते सुधारना चाहता है। लेकिन रिश्ते कैसे सुधरेंगे, यह उन्हें अच्छी तरह मालूम होना चाहिए। भारत ने जब-जब रिश्ते सुधारने की पहल की, उसका जवाब उसने उड़ी, पठानकोट, गुरदासपुर, नगरोटा के बड़े आतंकी हमलों के रूप में दिया है। ऐसे में पाकिस्तान अगर अभी से बयानों के पैंतरे चलने और बदलने लगेगा तो कैसे बात बनेगी!

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