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संपादकीय: प्रतिनिधि की पृष्ठभूमि

पहली जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की बनती है कि वे अपना प्रत्याशी तय करते समय उसकी पृष्ठभूमि का विशेष ध्यान रखें, ताकि लोगों का विश्वास खंडित न होने पाए और राजनीतिक शुचिता सुनिश्चत हो सके।

election commission of indiaप्रतीकात्मक तस्वीर।

राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती जाने को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। इसे रोकने के लिए राजनीतिक दलों से नैतिक अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसी छवि वाले लोगों को चुनाव में उतारने से परहेज करें, मगर यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती गई है। इसी के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने इस साल मार्च में यह नियम लागू किया कि अगर राजनीतिक दल आपराधिक छवि वाले लोगों को प्रत्याशी बनाते हैं, तो उन्हें बताना पड़ेगा कि उन्होंने साफ-सुथरी छवि वाले लोगों के बजाय ऐसे व्यक्ति को चुनाव मैदान में क्यों उतारा।

यह कारण उन्हें न सिर्फ निर्वाचन आयोग को बताना पड़ेगा, बल्कि पार्टियों को अपने सोशल मीडिया के मंचों पर भी सार्वजनिक करना पड़ेगा। प्रत्याशी के बारे में जानना लोगों का संवैधानिक अधिकार है। अभी तक प्रत्याशी अपना चुनाव नामांकन भरते समय शैक्षिक योग्यता, कमाई के स्रोत, आमदनी, संपत्ति, पारिवारिक पृष्ठभूमि, अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों आदि के बारे में हलफनामा देते रहे हैं, पर अब संबंधित राजनीतिक दलों को बताना पड़ेगा कि उन्होंने आपराधिक छवि होने के बावजूद किसी व्यक्ति को प्रत्याशी क्यों बनाया। लागू होने के बाद बिहार विधानसभा में पहली बार इस नियम पर अमल किया जाएगा।

अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते समय लोग अपेक्षा रखते हैं कि वह उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास करेगा, विकास संबंधी कार्यक्रमों के जरिए उनके जीवन और फिर समाज में बेहतरी लाएगा। मगर देखा गया है कि आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग राजनीति में पहुंच कर न सिर्फ अपने गुनाहों को मिटाने में जुट जाते, बल्कि भ्रष्टाचार और अपराध को बढ़ावा देने लगते हैं। इस तरह लोग ठगा हुआ महसूस करते हैं। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध तो है ही।

ज्यादातर लोग किसी राजनीतिक दल की विचारधारा और उसके कामकाज के तरीके पर भरोसा करके उस दल के प्रत्याशी को अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। उनके मन में कहीं न कहीं यह विश्वास होता है कि पार्टी भरोसेमंद है, इसलिए उसका प्रत्याशी भी भरोसेमंद होगा और अगर वह कहीं कुछ गड़बड़ करेगा, तो पार्टी उसे अनुशासित करके सही दिशा में ले जाएगी। मगर लोगों का यह विश्वास बार-बार टूटता देखा गया है।

ऐसे में पहली जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की बनती है कि वे अपना प्रत्याशी तय करते समय उसकी पृष्ठभूमि का विशेष ध्यान रखें, ताकि लोगों का विश्वास खंडित न होने पाए और राजनीतिक शुचिता सुनिश्चत हो सके।

मगर पिछले कुछ सालों से राजनीति में धनबल और बाहुबल का जोर काफी बढ़ता गया है। राजनीतिक दल ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारना चाहते हैं, जिनके जीतने की संभावना अधिक हो और वे अपने साथ-साथ पार्टी के चुनाव खर्च में भी सहयोग दे सकें। राजनीतिक पार्टियों की इसी कमजोरी का लाभ उठा कर अनेक गंभीर अपराधों के आरोपी भी राजनीतिक में प्रवेश कर जाते हैं और पार्टी की साख और अपने बाहुबल या धनबल से वे चुनाव भी जीत जाते हैं।

मतदाता तो पार्टी पर भरोसा करके उन्हें वोट डालते हैं, पर पार्टी भी उनके आपराधिक कृत्यों पर परदा डालती देखी जाती है, तो वे ज्यादा ठगा महसूस करते हैं। इसलिए चुनाव में इसके लिए राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करके निर्वाचन आयोग ने अच्छा कदम उठाया है। इससे पहले पायदान पर ही आपराधिक छवि के लोगों को रोकने में कुछ मदद मिल सकेगी। मगर जिस तरह अपने हलफनामे में प्रत्याशी दूसरी जानकारियां छिपाते देखे जाते हैं, उनके अपराधों को नहीं छिपाया जाएगा, देखने की बात है।

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