constantly increasing inflation in india gst claims to be proved wrong - संपादकीयः महंगाई की मार - Jansatta
ताज़ा खबर
 

संपादकीयः महंगाई की मार

जब भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो उसका सीधा असर वस्तुओं के दाम पर पड़ता है।

Author May 16, 2018 4:08 AM
प्रतीकात्मक चित्र

जब भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो उसका सीधा असर वस्तुओं के दाम पर पड़ता है। इसलिए अगर थोक मूल्य आधारित मुद्रास्फीति की दर अप्रैल में पिछले चार महीने में उच्चतम स्तर पर बढ़ कर 3.18 फीसद हो गई और खुदरा मुद्रास्फीति की दर 4.58 फीसद पर पहुंच गई तो महंगाई बढ़ना स्वाभाविक ही है। लेकिन महंगाई की समस्या के और गहराने की आशंका इसलिए भी है कि सोमवार को तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दामों में एक बार फिर से बढ़ोतरी कर दी। पिछले कुछ समय से र्इंधन के मूल्य निर्धारण की जो स्थिति बनी हुई है, उसमें इस बढ़ोतरी के टाले जाने का कारण कर्नाटक विधानसभा चुनाव को बताया जा रहा था।

शायद वह आकलन सही भी था, क्योंकि कर्नाटक में मतदान खत्म होने के बाद ही पेट्रोल की कीमत में सत्रह पैसे और डीजल के दाम में इक्कीस पैसे की वृद्धि कर दी गई। हालांकि महज उन्नीस दिन पहले जब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि की गई थी, तब भी यह साफ था कि इसका असर बाजार पर पड़ेगा। चूंकि बाजार में मौजूद लगभग सभी वस्तुओं की ढुलाई परिवहन पर निर्भर होती है, इसलिए डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर बहुत सारी चीजों की मूल्य वृद्धि के रूप में सामने आता है।

गौरतलब है कि मार्च में थोक महंगाई दर जब 2.47 फीसद दर्ज की गई थी, तब एक तरह से राहत महसूस हुई थी। मुद्रास्फीति में पिछले साल दिसंबर से ही गिरावट बनी हुई थी। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई और भारत में पेट्रोलियम के दाम चढ़े। फलों और सब्जियों सहित खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ने से थोक मुद्रास्फीति में भी तेजी आई और अब यह आंकड़ा 3.18 फीसद पर पहुंच गया। यों मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रित रखने के लिए रिजर्व बैंक नीतिगत दरों में वृद्धि का सहारा लेता रहा है। लेकिन पिछले कुछ सालों से मुद्रास्फीति की उच्च दर को नियंत्रित करने में मौद्रिक नीति की भूमिका कम हो रही है। निश्चित रूप से अर्थव्यवस्था की चमकती तस्वीर और विकास दर के ग्राफ के हवाले के बरक्स लोगों के जीवन स्तर को उनकी रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें ज्यादा प्रभावित करती हैं। इसके बेलगाम होने से सामान्य जरूरतों की खरीद-फरोख्त का संतुलन भी प्रभावित होता है।

जब जीएसटी लागू किया गया था, तब दावा किया गया था कि देश भर में जरूरत के सामान की कीमतों में एकरूपता आएगी और उनमें कमी आएगी। लेकिन यह दावा सही साबित नहीं हुआ। पिछले कुछ समय से लगातार बाजार में खासतौर पर खाने-पीने की वस्तुओं के दाम में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सवाल है कि सत्ता में आने के पहले भाजपा ने महंगाई कम करने के जो वादे किए थे, उन्हें पूरा करने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की गई!

आजकल जिस तरह के सवाल राजनीति में हावी रहते हैं, उनमें महंगाई कोई मुद्दा नहीं बन पाती। लेकिन अगर कभी इस पर चिंता बढ़ने लगती है तो सरकार महंगाई कम होने का दावा करती है। पिछले साल जब सरकार महंगाई की दर नीचे गिरने के दावे कर रही थी, उस समय भी खुदरा बाजार में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें काफी ऊंची थीं। जिस दौर में कई वजहों से रोजगार का क्षेत्र काफी सिकुड़ता गया है, लोगों के सामने रोजी-रोटी का सवाल एक बड़ी चिंता बन कर उभरा है, उसमें जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतें दोहरी मार की तरह हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App