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संपादकीयः कांग्रेस की मुश्किल

गुरुवार को आए चुनावनतीजों ने कांग्रेस को गहरी मुश्किल में डाल दिया है। यों पार्टी पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से ही यानी दो साल से, बिहार चुनाव को छोड़ दें, तो लगातार पराभव का दंश झेल रही है।

Author May 21, 2016 02:42 am

गुरुवार को आए चुनावनतीजों ने कांग्रेस को गहरी मुश्किल में डाल दिया है। यों पार्टी पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से ही यानी दो साल से, बिहार चुनाव को छोड़ दें, तो लगातार पराभव का दंश झेल रही है। बिहार में लंबे समय बाद उसे जरूर दिन थोड़े फिरने का अहसास हुआ था। पर यह उसके अपने बूते पर नहीं हुआ, उसे राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (एकी) के साथ गठबंधन में होने का लाभ मिला था। बिहार के अपवाद को अलग कर दें, तो पार्टी में हताशा का सिलसिला दो साल से बराबर बना रहा है। ताजा चुनाव नतीजों के चलते यह हताशा और गहरी हुई है। इसकी प्रतिक्रिया पार्टी के भीतर भी सुनाई देने लगी है। पहले दिग्विजय सिंह और फिर शशि थरूर ने कहा कि आत्म-चिंतन और आत्म-निरीक्षण बहुत हो चुका, अब एक्शन यानी कार्रवाई या ठोस कदम उठाने की जरूरत है। अलबत्ता उन्होंने फिलहाल यह साफ नहीं किया है कि एक्शन से उनका क्या मतलब है। कांग्रेस के इन दोनों नेताओं की प्रतिक्रिया एक संकेत मात्र है, अंदाजा लगाया जा सकता है कि पार्टी किस आंतरिक मंथन और छटपटाहट से गुजर रही होगी।

इसके खासकर दो कारण हैं। एक के बाद एक चुनावी हार के फलस्वरूप अब बड़े राज्यों में सिर्फ कर्नाटक बचा है जहां कांग्रेस की सरकार है। दूसरी वजह है राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रभावी न हो पाना। लोकसभा चुनाव में पार्टी ने राहुल गांधी को अपने चेहरे के तौर पर पेश किया था। पर वे न केवल मई 2014 के आम चुनाव में बल्कि उसके बाद भी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। वे अपनी पसंद या सुविधा से कभी कोई मुद्दा चुनते हैं, फिर कुछ दिन बाद उसे छोड़ देते हैं। पार्टी अक्सर नहीं जान पाती कि बहुत सारे अहम मसलों पर उनका नजरिया और रणनीति क्या है। मुद््दों को लेकर निरंतरता और सक्रियता सरकार को घेरने के लिए जरूरी है। पर जब पार्टी नेतृत्व के स्तर पर ही इसका अभाव हो, तो नीचे के स्तरों पर क्या उम्मीद की जाए!

सांगठनिक कमजोरी पार्टी की एक और प्रमुख समस्या है, जो दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। जनाधार वाले लोगों को आगे लाकर और दूसरी तथा तीसरी कतार के नेतृत्व को ज्यादा मौका देकर पार्टी अपने को कुछ संभाल सकती है, पर लगता है यह तकाजा भी भुला दिया गया है। असम में इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। पंद्रह साल लगातार मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई को ही इस बार भी पार्टी ने अपने चुनावी चेहरे के तौर पर पेश किया और उन्हें अपने बेटे की राजनीतिक किस्मत संवारने की छूट दी।

नतीजतन, असम कांग्रेस में असंतोष पनपा और कई प्रमुख लोगों ने पार्टी छोड़ दी। जैसा कि हार के बाद किसी भी पार्टी में होता है, कांग्रेस में आत्म-समीक्षा होगी, या इसकी मांग उठेगी। लोकसभा चुनाव के बाद भी यह हुआ था, हार के कारणों पर विचार करने के लिए एक समिति भी गठित हुई थी। पर आज कोई नहीं जानता कि उस आत्म-समीक्षा के नाम पर वास्तव में क्या हुआ और उससे क्या हासिल हुआ। कांग्रेस-शासित राज्यों में सत्ता-विरोधी रुझान को परवान चढ़ाने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कांग्रेस चाहे तो गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यही रणनीति अपनाकर अपना शक्ति-संवर्धन कर सकती है। पर इसके लिए प्रांतीय और केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर और सांगठनिक रूप में जिस तैयारी की जरूरत है, क्या उसके लक्षण दिखते हैं!

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