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संपादकीयः थप्पड़मार सियासत

इस लोकतंत्र में खुद जनप्रतिनिधि कितने लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करते हैं, इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश के धार जिले में दिखाई दिया। वहां के कांग्रेसी विधायक ने एक भाजपा नेता को सरेआम थप्पड़ रसीद कर दिया।

Author August 27, 2018 5:14 AM
जनतंत्र में किसी भी तरह की हिंसा की कोई जगह नहीं होती। पर काश, हमारे राजनेता इसे अपने जीवन में उतार पाते!

इस लोकतंत्र में खुद जनप्रतिनिधि कितने लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करते हैं, इसका ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश के धार जिले में दिखाई दिया। वहां के कांग्रेसी विधायक ने एक भाजपा नेता को सरेआम थप्पड़ रसीद कर दिया। मौका बिजली का तार छू जाने से मारी गई एक बच्ची के परिजनों को सरकारी मुआवजे का चेक सौंपने का था। मध्यप्रदेश शासन ने मृत बच्ची के परिजनों को पांच लाख रुपए की सहायता राशि घोषित की थी, जिसका चेक देने के लिए वहां की भाजपा सांसद पहुंची थीं। इस बात की जानकारी जब स्थानीय विधायक को मिली तो वह भी अपने समर्थकों के साथ वहां पहुंच गए। चेक किसके हाथों दिया जाए, इसी बात को लेकर दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच बहस शुरू हो गई। उसी बहस के दौरान कांग्रेसी विधायक ने भाजपा के स्थानीय नेता को थप्पड़ जड़ दिया। पुलिस ने बीच-बचाव किया। राजनेता किसी भी बात का श्रेय लूटने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते, चाहे वह शोक का ही अवसर क्यों न हो। विचित्र है कि दोनों दलों के नेता सिर्फ इसलिए भिड़ गए कि वे अपने हाथों सरकारी चेक देकर स्थानीय लोगों के बीच खुद को उनका मसीहा साबित करना चाहते थे।

मध्यप्रदेश में विधानसभा के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, इसलिए समझना मुश्किल नहीं है कि राजनीतिक दलों में वोट बटोरने की कोशिशें किस कदर तेज होंगी। यों चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों पर अपने निर्वाचन क्षेत्रों की समस्याओं को भुला देने, लोगों से दूरी बना लेने के आरोप आम हैं। चुनाव के समय किए वादे पूरा करने के मामले में प्राय: उन्हें विफल ही देखा गया है। यही वजह है कि बहुत सारे लोगों तक बुनियादी सुविधाएं भी नहीं पहुंच पातीं। पर जब कोई किसी भी तरह की उपलब्धि हासिल हो या किसी काम का श्रेय लूटने का मौका हो, तो वे बढ़-चढ़ कर दावा करते हैं। अपने छोटे-से काम को भी बहुत बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करते हैं। चुनाव नजदीक आने पर अपने को सक्रिय नेता के रूप में दिखाने की उनमें जैसे होड़ लग जाती है। मध्यप्रदेश की घटना भी इसी होड़ का नतीजा है। हैरानी की बात है कि वे यह भी भूल गए कि एक मृत बच्ची के शोक-संतप्त परिवार को सांत्वना देने गए थे। कहां तो वे उन कमियों को दूर करने और बच्ची की मृत्यु के लिए दोषी व्यवस्था को सुधारने के उपायों पर विचार करते, वे सरकारी मुआवजे को सिर्फ अपने हाथ से देने को हिंसक हो उठे!

हालांकि यह पहली घटना नहीं है, जब किसी जनप्रतिनिधि ने किसी दूसरे दल के कार्यकर्ता पर हाथ उठाया या सार्वजनिक रूप से हिंसक हो उठा। पर इससे एक बार फिर यही रेखांकित हुआ है कि राजनेता अब लोकतांत्रिक मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। जिस तरह राजनीति में बाहुबल और धनबल का प्रदर्शन बढ़ा है, उससे राजनेताओं का इन पर भरोसा भी बढ़ता गया है। इसी का नतीजा है कि वे सार्वजनिक सभाओं में थप्पड़ मारने जैसी हरकतें करने से परहेज नहीं करते। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब खुद जनप्रतिनिधि ऐसी हरकतें करते हैं, तो उनके समर्थकों में क्या संदेश जाता होगा। वे ऐसे व्यवहारों से प्रेरणा लेते और पूरे विश्वास के साथ उसे सामान्य व्यवहार में उतारते हैं। जनतंत्र में किसी भी तरह की हिंसा की कोई जगह नहीं होती। पर काश, हमारे राजनेता इसे अपने जीवन में उतार पाते!

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