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संपादकीय : सत्ता से बाहर

आखिरकार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया। कांग्रेस की ओर से यह मांग भी की जा रही थी कि उन्हें विधानसभा अध्यक्ष के सामने उपस्थित किया जाए। मगर घटनाक्रम में जिस तरह के उतार-चढ़ाव आ रहे थे, उससे पार्टी को शायद इसका आभास हो गया था कि बागी विधायकों को वापस पार्टी में लाना संभव नहीं है।

मध्यप्रदेश के सीएम कमलनाथ ने दिया इस्तीफा

काफी जद्दोजहद के बाद आखिरकार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस्तीफा दे दिया। हालांकि गुरुवार को ही सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश आ गया था कि शुक्रवार को पांच बजे तक बहुमत परीक्षण सुनिश्चित किया जाए। इससे पहले कांग्रेस की ओर से सरकार के सुरक्षित होने और बहुमत साबित करने के दावे किए जा रहे थे। लेकिन बागी विधायकों का जैसा रुख बना रहा, उससे यह साफ लग रहा था कि कमलनाथ सरकार संकट से घिरी हुई है और अब उसका जाना लगभग तय है। इसके बावजूद कांग्रेस को यह उम्मीद थी कि कथित तौर पर बंधक बनाए गए बागी विधायकों को सामने लाया जाएगा तो वे पार्टी और सरकार के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर करेंगे।

कांग्रेस की ओर से यह मांग भी की जा रही थी कि उन्हें विधानसभा अध्यक्ष के सामने उपस्थित किया जाए। मगर घटनाक्रम में जिस तरह के उतार-चढ़ाव आ रहे थे, उससे पार्टी को शायद इसका आभास हो गया था कि बागी विधायकों को वापस पार्टी में लाना संभव नहीं है। शायद यही वजह है कि विधानसभा में बहुमत परीक्षण का सामना करने के बजाय मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस्तीफा देना बेहतर समझा। जाहिर है, कमलनाथ के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद विधानसभा में सदस्यों की संख्या और बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए जिस समीकरण और संख्या की जरूरत है, उसके मुताबिक अब भाजपा की सरकार बननी तय लग रही है। लेकिन मध्यप्रदेश में सरकार बनने और गिरने के बीच चले इस खेल से एक बार फिर यही साबित हुआ है कि जनता के वोट लेने के आधार का सत्ता के सरोकार से शायद ज्यादा वास्ता नहीं होता।

सवाल है कि जिन बाईस विधायकों ने बगावत की थी, क्या उनका अपनी पार्टी और सरकार की नीतियों से कोई विरोध था या फिर उन्होंने किसी खेमेबाजी की राजनीति के तहत अपना पक्ष बदलने का रास्ता अख्तियार किया? कांग्रेस ने ये आरोप लगाए भाजपा की ओर से विधायकों की खरीद-फरोख्त का बड़ा खेल खेला गया। लेकिन अगर इतनी बड़ी तादाद में कांग्रेस के विधायकों के भीतर असंतोष पल रहा था और वे बगावत की राह पर बढ़ रहे थे तो पार्टी के शीर्ष नेताओं को इसके असर का अंदाजा कैसे नहीं हुआ और उन्हे वक्त पर संभालने की कोशिश क्यों नहीं हुई? दरअसल, मध्यप्रदेश में चुनावी नतीजे आने के बाद जब सरकार बनाने की कवायदें चल रही थीं, तभी असंतोष के ध्रुव साफ दिखने लगे थे। माना जा रहा था कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुट में बंटी कांग्रेस के सामने सरकार बनाने के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बिठाना एक बड़ी चुनौती है। तब किसी तरह पार्टी ने मामले को संभाल कर कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाने की स्थिति बना ली थी।

लेकिन पार्टी के विधायकों की बगावत और सिंधिया के पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल होने के बाद अब जो तस्वीर साफ हुई है, उससे साफ है कि तब शायद संकट का महज तात्कालिक हल निकाला गया था और वह असंतोष को ढकने की कोशिश थी। यों दल-बदल से जुड़ी गतिविधियों के बाद मध्यप्रदेश में सरकार गिरना ऐसा कोई पहला उदाहरण नहीं है। लेकिन यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है कि जिस राजनीतिक निष्ठा और नैतिकता की जमीन पर खड़े होकर जनता से वोट मांगे जाते हैं, लोग उस विचार से प्रभावित और सहमत होकर किसी उम्मीदवार को समर्थन देते हैं, तो जीत के बाद बिना किसी बड़ी वजह के उसमें बदलाव कैसे आ जाता है? लोकतंत्र में नेताओं को अपने विचार तय करने का अधिकार भी है, लेकिन इसमें उस जनता का पक्ष कहां होता है जिन्होंने विचार के आधार पर किसी नेता को अपना प्रतिनिधि चुना होता है?

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