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संपादकीयः गठबंधन का गणित

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में आखिरकार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो गया।

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में आखिरकार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो गया। हालांकि इन दोनों पार्टियों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने के कयास तभी लगाए जाने लगे थे जब कांग्रेस के प्रतिनिधि और सलाहकार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिले थे। पर पहले चरण के चुनाव के लिए नामांकन की अंतिम तिथि से एक दिन पहले दोनों पार्टियों में सीटों के बंटवारे का एलान हो पाया है। कांग्रेस एक सौ पांच सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इस गठबंधन का मकसद भाजपा को सत्ता में आने से रोकना है। यह फार्मूला सपा ने बिहार विधानसभा चुनावों में हुए महागठबंधन के नतीजों से प्रेरित होकर लिया। पार्टियां तभी साथ मिल कर चुनाव लड़ने का फैसला करती हैं, जब वे खुद को कहीं न कहीं कमजोर पाती हैं। हालांकि अखिलेश यादव के कामकाज को लेकर प्रदेश में नाराजगी नहीं है, पर लोकसभा चुनावों के बाद वहां जिस तरह का समीकरण बना है, उसमें सपा की स्थिति कमजोर हुई है। ऐसे में उसे ऐसे दलों को साथ लेकर चलना ज्यादा कारगर समझ आया, जो समाजवादी सिद्धांतों में यकीन करते और सांप्रदायिकता के विरोध में रहे हैं। इस तरह कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल और दूसरे कई दल उसके साथ खड़े होने को तैयार नजर आए।

कांग्रेस लंबे समय से उत्तर प्रदेश में सत्ता का वनवास झेल रही है। ऐसे में उसे सपा के साथ मिल कर अपना आधार कुछ मजबूत करने पाने की उम्मीद है। लोकसभा चुनावों के बाद सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बसपा के अलावा भाजपा बन कर उभरी है। उत्तर प्रदेश चुनावों में सपा को उनतीस फीसद से ऊपर वोट मिले थे और वह पूरे बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। मगर लोकसभा चुनावों के समय उसका वोट प्रतिशत घट कर बाईस प्रतिशत से थोड़ा ऊपर रह गया था। इसी तरह कांग्रेस को विधानसभा में मिले करीब बारह फीसद वोट घट कर सात प्रतिशत से कुछ अधिक रह गए थे। जाहिर है, अगर ये दोनों दल अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरते तो उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता। इन दोनों के साथ मिल कर चुनाव लड़ने से सबसे बड़ा फायदा यह होने की उम्मीद है कि बिखरे हुए मुसलमान मतदाता इस गठबंधन का साथ दे सकते हैं। और अभी तक उत्तर प्रदेश चुनावों का गणित यही बताता है कि जिस दल के साथ मुसलमान मतदाता होते हैं, उसकी जीत आसान हो जाती है।

हालांकि अखिलेश यादव के पास गिनाने को कई उपलब्धियां हैं। अपने घोषणापत्र में उन्होंने कई लुभावने वादे भी किए हैं। इसके अलावा केंद्र में भाजपा सरकार के कामकाज से लोगों में कुछ चीजों को लेकर निराशा हुई है। पर पिछले दिनों जिस तरह पार्टी में खींचतान चली, उससे कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ा। हालांकि अखिलेश यादव कई दागी नेताओं को पार्टी से दूर करने में कामयाब हुए और यह भी उनकी एक उपलब्धि मानी जा रही है। मगर कांग्रेस और सपा का गठबंधन जिस आनन-फानन में हुआ है, उससे दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच चुनाव में तालमेल बनाने और तैयारियों को लेकर समीकरण तय करने में कठिनाई आ सकती है। पहले चरण के चुनाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होने हैं, जहां सपा सरकार को मुजफ्फरनगर दंगों को रोक पाने में विफलता के कारण काफी नाराजगी झेलनी पड़ी थी। हालांकि सब कुछ के बावजूद इस गठबंधन से अब भाजपा और बसपा के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।

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