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संपादकीयः चुनाव से पहले

पिछले दिनों उपचुनावों के लिए हुए मतदान के दौरान खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में सैकड़ों की संख्या में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें खराब मिलीं। यह कैसा चुनाव प्रबंधन है?

Author June 5, 2018 03:06 am
एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनेक कसौटियों में सबसे पहली कसौटी यही होती है कि चुनाव निष्पक्ष हों, और निष्पक्ष दिखें भी।

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनेक कसौटियों में सबसे पहली कसौटी यही होती है कि चुनाव निष्पक्ष हों, और निष्पक्ष दिखें भी। मतदाता सूची तैयार करने से लेकर चुनाव संपन्न कराने और वोटों की गिनती तक, हर स्तर पर उनकी विश्वसनीयता असंदिग्ध हो। लिहाजा मध्यप्रदेश की मतदाता सूची को लेकर जो सवाल उठा है वह बेहद गंभीर है। कांग्रेस ने मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने राज्य की मतदाता सूची में साठ लाख फर्जी नाम शामिल कराकर चुनाव जीतने की साजिश रची थी। राज्य सरकार पर कांग्रेस के आरोप में कितनी सच्चाई है यह अभी से कहना मुश्किल है, क्योंकि फिलहाल यह साफ नहीं है कि ये गड़बड़ियां कैसे हुर्इं, और इनके पीछे किसका हाथ है? इन्हें सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया गया, या ये बस लापरवाही और काहिली की देन हैं? लेकिन अगर कांग्रेस का यह दावा सही है कि मध्यप्रदेश की मतदाता सूची में साठ लाख फर्जी नाम हैं, तो यह बहुत ही गंभीर आरोप है, और इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का बारह फीसद है, जबकि पिछली बार राज्य में हार-जीत का अंतर नौ फीसद रहा था।

यह कैसे हो सकता है कि पिछले दस साल में राज्य की आबादी में बढ़ोतरी चौबीस फीसद हो, पर मतदाताओं की संख्या में चालीस फीसद की बढ़ोतरी हो जाए! आरोप की गंभीरता का अंदाजा जांच कराने के चुनाव आयोग के फैसले से भी होता है। सौंपे गए तथ्यों और सबूतों में प्रथम दृष्टया इतनी प्रामाणिकता जरूर दिखी होगी कि आयोग के लिए उसे नकार पाना संभव नहीं हुआ होगा। जब फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र के साथ मतदान की शुरुआत हुई तो यह उम्मीद की गई कि कुछ लोगों के नाम मतदाता सूची से अचानक गायब मिलने या किसी का नाम एक से अधिक जगह दर्ज होने जैसी गड़बड़ियां नहीं होंगी। और यह सही है कि पहले के मुकाबले ऐसी शिकायतें धीरे-धीरे काफी कम हो गर्इं। इसलिए मध्यप्रदेश की मतदाता सूची को लेकर जो खुलासा सामने आया है वह हैरानी में डालने वाला है। यह कैसे हो गया कि एक ही फोटो के साथ अलग-अलग नाम, अलग-अलग जगह, पिता या पति के भिन्न-भिन्न नाम सहित दर्ज हो गए? निर्वाचन आयोग ने ऐसी गड़बड़ियों की जांच कराने के लिए चार समितियां गठित की हैं। लेकिन क्या जांच पूरी तह में जाकर होगी? क्या जवाबदेही तय होगी? जांच इस पहलू से भी होनी चाहिए कि क्या गड़बड़ी के पीछे कोई सुनियोजित मंशा काम कर रही थी?

पिछले दिनों उपचुनावों के लिए हुए मतदान के दौरान खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में सैकड़ों की संख्या में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें खराब मिलीं। यह कैसा चुनाव प्रबंधन है? आयोग ने कहा कि गरमी की वजह से वे खराब हुर्इं। लेकिन कई जगह इवीएम शुरू से ही यानी सुबह के वक्त भी काम नहीं कर रही थीं। तब गरमी को ही कारण क्यों माना जाए! वजह जो भी रही हो, ऐसे मामलों से चुनाव की विश्वसनीयता पर आंच आती है। हमारे निर्वाचन आयोग का शानदार इतिहास रहा है। एक संवैधानिक संस्था के रूप में इसने अपने कर्तव्यों का निर्वाह हमेशा बहुत जिम्मेदारी से किया है। पर कभी-कभी आयोग के किसी फैसले को लेकर सवाल भी उठे हैं, मसलन गुजरात चुनाव की तारीखें जिस तरह तय की गर्इं उस पर विवाद उठा था। चाहे इवीएम की गड़बड़ी हो या मतदाता सूची की, आयोग अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

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