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सराहनीय सहयोग

दारुल उलूम ने मदरसों में पढ़ाई-लिखाई का बेहतर माहौल बनाने की दृष्टि से सरकारी सर्वेक्षण का स्वागत किया है।

सराहनीय सहयोग
सांकेतिक फोटो।

आखिरकार उत्तर प्रदेश में मदरसों के सर्वेक्षण को लेकर सरकार की मंशा पर शक और विवाद की गुंजाइश समाप्त हो गई है। दारुल उलूम देवबंद ने इस सर्वेक्षण का स्वागत किया और इसमें सभी मदरसों से सहयोग देने की अपील की है। जमीअत-उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष ने इस सर्वेक्षण की तारीफ की और कहा कि इससे मदरसों में पढ़ाई-लिखाई का माहौल बेहतर होगा।

दरअसल, सरकार को आशंका है कि कुछ गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे बाहर से आर्थिक मदद लेते और अपने यहां कट्टरपंथी, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले पाठ पढ़ाते हैं। इसलिए ऐसे मदरसों का सर्वेक्षण कराने का फैसला किया गया। इस पर असदुद्दीन ओवैसी जैसे कुछ नेताओं ने कहा कि दरअसल सरकार इसके जरिए मुसलिम समाज पर दबाव बनाने का प्रयास कर रही है। यह एक तरह से ‘मिनी एनआरसी’ है।

इस तरह इस सर्वेक्षण को लेकर विवाद और लोगों में भ्रम पैदा हो गया। अच्छी बात है कि दारुल उलूम ने खुद इस भ्रम को मिटाने का प्रयास किया और यह भी भरोसा दिलाया कि मदरसों के पास कुछ भी छिपाने लायक नहीं है। सभी मदरसा संचालक अपने कागजात दुरुस्त रखें और सर्वेक्षण में सहयोग करें। सरकार ने निर्देश दिया है कि पच्चीस अक्तूबर तक मदरसों का सर्वेक्षण पूरा कर लिया जाए। इसके लिए बारह बिंदु तैयार किए गए हैं।

हालांकि सर्वेक्षण के इन बिंदुओं में कोई ऐसा बिंदु नहीं है, जिससे मुसलिम समुदाय की भावना को चोट पहुंचे या उनके निजी जीवन में किसी तरह की दखलंदाजी हो। हां, उसमें तीन बिंदु ऐसे हैं, जिनसे कुछ मदरसों को परेशानी हो सकती है। एक तो यह कि सर्वेक्षण में यह भी जानने का प्रयास होगा कि वहां क्या पढ़ाया जाता है, यानी उनका पाठ्यक्रम क्या है। दरअसल, बहुत सारे गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों का कोई तय पाठ्यक्रम नहीं है।

वे अपनी मर्जी से पाठ्यक्रम तय करते हैं। दूसरा बिंदु है कि संबंधित मदरसे को धन कहां से प्राप्त होता है। उसका संबंध किसी संगठन या स्वयंसेवी संस्था से है या नहीं। बाकी बिंदु मदरसे में विद्यार्थियों से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं, उनके कमरों आदि के आकार को लेकर हैं। ऐसे में अगर कुछ मदरसे सचमुच किसी संदिग्ध संस्था से जुड़े हैं और उन्हें नाजायज तरीके से धन प्राप्त होता है, उनके पाठ्यक्रम में कुछ देश-विरोधी बातें पढ़ाई जाती हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। ऐसी कार्रवाई अनुचित भी नहीं कही जा सकती। किसी भी शिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों के दिमाग को दूषित करने का प्रयास क्यों होना चाहिए।

हमारे देश में मदरसों का समृद्ध इतिहास रहा है और चाहे वह आजादी की लड़ाई रही हो या समाज सुधार से संबंधित आंदोलन, सबमें मदरसों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है। अब मदरसे बदलते समय के अनुसार गणित, विज्ञान आदि की शिक्षा में भी बेहतर काम कर रहे हैं। ऐसे में अगर कुछ गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे अपनी मर्जी के मुताबिक विद्यार्थियों में कुंदजेहनी पैदा करें, उन्हें देश-विरोधी गतिविधियों के लिए उकसाएं, तो उन्हें किसी भी दृष्टि से कोई तरक्कीपसंद मुसलमान भी नहीं पसंद करेगा।

स्वाभाविक ही दारुल उलूम ने मदरसों में पढ़ाई-लिखाई का बेहतर माहौल बनाने की दृष्टि से सरकारी सर्वेक्षण का स्वागत किया है। किसी भी शिक्षण संस्थान का मकसद अपने विद्यार्थियों को एक बेहतर, उर्वर और उत्पादक दिमाग के रूप में विकसित करने का होना चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं कर पा रहे, तो उन्हें चलाने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। दारुल उलूम का फैसला सराहनीय है।

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