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संपादकीयः सांसत में श्रमिक

प्रवासी मजदूरों के बारे में जानकारी जुटाना कोई कठिन काम नहीं माना जा सकता। आजकल हर काम आनलाइन होने लगा है, सरकारें उसके जरिए यह आंकड़ा जुटा सकती हैं।

आजकल हर काम आनलाइन होने लगा है, सरकारें उसके जरिए यह आंकड़ा जुटा सकती हैं।

पूर्णबंदी के वक्त प्रवासी मजदूरों का जत्थों में पैदल ही अपने गांवों की तरफ लौटना एक कारुणिक दृश्य था। बंदी की वजह से बहुत सारे कल-कारखाने बंद हो गए, दिहाड़ी के काम, रेहड़ी-पटरी के कारोबार बंद थे। इस तरह बहुत सारे लोगों के लिए दो वक्त का भोजन जुटाना मुश्किल हो गया। कोरोना संक्रमण पर कब तक काबू पाया जा सकेगा, कब तक फिर काम-धंधे पुराने ढर्रे पर लौट पाएंगे, कुछ निश्चित नहीं था। इसलिए लाखों लोगों ने अपने गांवों का रुख कर लिया था। वे फिर उसी मुफलिसी और बदहाली के आलम में लौटने को मजबूर हुए, जिससे भाग कर वे कुछ बेहतरी की उम्मीद लिए शहरों की तरफ पलायन कर गए थे। तब तमाम संगठनों और राजनीतिक दलों ने सरकार से गुजारिश की थी कि इन श्रमिकों को जंदगी बसर करने के लिए कुछ आर्थिक मदद मुहैया कराई जानी चाहिए। तब केंद्र और राज्य सरकारों ने सीधे प्रवासी मजदूरों के खाते में पैसे डालने का वादा किया था।

इसके अलावा मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के जरिए स्थानीय स्तर पर उनके लिए काम उपलब्ध कराने की भी योजना बनी थी। मगर फिलहाल स्थिति यह है कि अपने गांव लौटे इन श्रमिकों के लिए अपने परिवार का पेट पालना मुश्किल हो रहा है। कई जगहों पर बदहाली आजिज आकर कुछ श्रमिकों के खुदकुशी करने और असम में एक श्रमिक के अपना नवजात शिशु तक बेचने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र परिषद का आकलन है कि आने वाले दिनों में अभी गरीबी और बढ़ेगी।

मगर इसके बरक्स हमारी सरकार की स्थिति यह है कि जब संसद में घर वापस लौटते हुए मारे गए और घायल मजदूरों के बारे में पूछा गया तो जवाब मिला कि उनसे संबंधित कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। जब घायल हुए और मारे गए मजदूरों का आंकड़ा नहीं है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपने काम-धंधे गंवा चुके और जैसे-तैसे गांव लौटे श्रमिकों के बारे में वास्तविक जानकारी सरकार के पास कितनी होगी। वहीं एक संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि प्रवासी श्रमिकों के लिए एक विशेष कोष बनाया जाना चाहिए। मगर पहले तो सरकार के पास आंकड़ा होना चाहिए कि वास्तव में प्रवासी मजदूर कितने हैं, कितनों ने अपने काम-धंधे गंवाए हैं और उनमें से कितने बंदी खुलने के बाद फिर से गुजारे लायक कुछ कर पाने की स्थिति में लौट आए हैं। अगर सरकारें सचमुच श्रमिकों के लिए किसी कल्याणकारी योजना को लेकर गंभीर होतीं, तो अब तक उनके बारे में जानकारियां जुटाने का उपाय कर चुकी होतीं।

प्रवासी मजदूरों के बारे में जानकारी जुटाना कोई कठिन काम नहीं माना जा सकता। आजकल हर काम आनलाइन होने लगा है, सरकारें उसके जरिए यह आंकड़ा जुटा सकती हैं। उसकी प्रामाणिक जांचने के लिए ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों की मदद ली जा सकती है। कारखाना मालिकों, व्यवसायियों से विवरण मांगे जा सकते हैं कि पहले उनके यहां कितने लोग काम करते थे और अब कितने करते हैं। संगठित क्षेत्र में काम कर रहे श्रमिकों के बारे में जानकारी जुटाना आसान है, मगर जब वह काम सरकारी स्तर पर नहीं हो पा रहा, तो असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के बारे में आंकड़ा इकट्ठा करने में कितनी गंभीरता दिखाई जाएगी, कहना मुश्किल है, क्योंकि यह क्षेत्र सदा से उपेक्षित रहा है। मगर सरकारें श्रमिकों के प्रति अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकतीं, उन्हें उनकी सुध लेनी ही चाहिए।

 

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