CJP Protest: कुछ समय पहले दिल्ली के जंतर मंतर पर काकरोच जनता पार्टी की अगुआई में विद्यार्थियों के विरोध प्रदर्शन के खिलाफ पुलिस ने जिस तरह की बेलगाम कार्रवाई की थी, उस पर हर तरफ से तीखे सवाल उठे थे।
यह भी कहा गया कि अगर विद्यार्थियों का अपने मुद्दों पर बात करना, सरकार से खामियों को दुरुस्त करने की मांग करना इतना मुश्किल है और इसके बदले उन्हें पुलिस की बेरहम कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा, तो यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के कितना अनुरूप है।
यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मसले पर तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई और मारपीट देखना बेहद दुखद है। अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस अफसरों से अपेक्षित तटस्थता भी गायब होती दिख रही है। कायदे से पुलिस-प्रशासन और सरकार को अदालत की इस टिप्पणी पर गौर करते हुए अपने रवैये में सुधार करने की जरूरत थी।
मगर शीर्ष अदालत की टिप्पणियों की पुलिस को कितनी फिक्र है, यह सिर्फ इतने से ही समझा सकता है कि जंतर मंतर पर प्रदर्शन में शामिल होेने को कारण बता कर विद्यार्थियों को नोटिस देना शुरू कर दिया गया है। जबकि इसी मसले पर सुप्रीम कोर्ट पुलिस के रवैये पर नाराजगी जता चुका है।
गौरतलब है कि जंतर मंतर पर हुए प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में नोएडा की कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र के खिलाफ नोटिस जारी कर दिया था। इस मसले पर सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कार्यकारी मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा कि शीर्ष अदालत के पहले के आदेश के बावजूद मजिस्ट्रेट ने ऐसा नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे की।
दरअसल, अदालत ने अपने पहले के आदेश में साफ तौर पर कहा था कि किसी भी विद्यार्थी के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी। जाहिर है, दिल्ली में प्रदर्शन और उसमें हुई कार्रवाई के संदर्भ में अदालत ने एक तरह से स्पष्ट लहजे में पुलिस और प्रशासन को एक बार फिर उसकी सीमा याद दिलाई है। हालांकि छात्र को जारी नोटिस बाद में वापस ले लिया गया, लेकिन यह विचित्र है कि नोएडा की कार्यकारी मजिस्ट्रेट को यह कार्रवाई करते हुए अदालत के निर्देश का खयाल रखने की जरूरत महसूस नहीं हुई थी।
सवाल यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद अगर किसी छात्र को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए नोटिस जारी किया जाता है, इस दुस्साहस का स्रोत आखिर क्या है? क्या ऐसा परोक्ष रूप से सरकार के संरक्षण और निर्देश की वजह से किया जाता है? अगर ऐसा नहीं है, तो पुलिस या प्रशासन की नजर में शीर्ष अदालत के निर्देशों की क्या अहमियत है? यह समझना मुश्किल है कि जब पुलिस को किसी आंदोलन से निपटने के लिए तैनात किया जाता है, तो संवाद के जरिए समाधान की राह खोजने के बजाय कई बार वह बिना किसी हिचक के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अधिकतम बेरहम क्यों हो जाती है।
यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर शांतिपूर्ण तरीके से किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए बलप्रयोग या कार्रवाई की धमकी का सहारा लिया जाएगा, तो इसका देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर दूरगामी असर पड़ेगा।
सरकार की ओर से हुई लापरवाही या उसकी किसी कमी पर सवाल उठाना या अपनी मांगों के साथ सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना आम नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। अभिव्यक्ति का यह अधिकार अगर सुरक्षित है, तो इसी से लोकतंत्र का जीवन बचेगा।
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