शहरों के सूचकांक

शहरों का विकास और प्रबंधन अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करता है।

सांकेतिक फोटो।

शहरों का विकास और प्रबंधन अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करता है। इसलिए हर सरकार का प्रयास होता है कि शहरों की बुनियादी सुविधाएं बेहतर बनाने के साथ-साथ उन्हें व्यापारिक-वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए सहज और सुलभ बनाया जाए। इसी मकसद से वर्तमान केंद्र सरकार ने सौ शहरों को स्मार्ट शहर बनाने का लक्ष्य घोषित किया था। इस मामले में कितने शहर अपने लक्ष्य की दिशा में कहां तक आगे बढ़ पाए हैं, उसे नीति आयोग के ताजा सर्वेक्षण से समझा जा सकता है। नीति आयोग ने सतत विकास लक्ष्य के आधार पर शहरों के सूचकांक जारी किए हैं।

इसमें शिमला, कोयंबटूर और चंडीगढ़ सहित दस शहर अव्वल हैं, तो धनबाद, ईटानगर और मेरठ सहित दस शहर फिसड््डी घोषित किए गए हैं। इस सर्वेक्षण में कुल छप्पन शहरों को लिया गया, जिनमें से चौवालीस शहरों की आबादी दस लाख से अधिक है और बारह शहर विभिन्न राज्यों की राजधानी हैं, जिनकी आबादी दस लाख से कम है। सौ अंकों के आधार पर किए गए शहरों के इस मूल्यांकन के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो, शिक्षा के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली सहित विभिन्न मंत्रालयों के पोर्टलों से आंकड़े एकत्र किए गए।

इस मूल्यांकन से पता चलता है कि जिन शहरों ने सौ के आसपास अंक हासिल किए, वे दो हजार तीस तक सतत विकास लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं, जबकि शून्य अंक का मतलब है कि वे शहर लक्ष्य से काफी दूर हैं। जाहिर है, इससे नीति आयोग को उन शहरों के प्रशासन और संबंधित सरकारों पर विकास लक्ष्यों की तरफ बढ़ने की दिशा में प्रयास के लिए दबाव डालने में मदद मिलेगी। छिपी बात नहीं है कि अब देश की बड़ी आबादी शहरों की तरफ भाग रही है। गांव खाली हो रहे हैं। कृषि पर लोगों की निर्भरता लगातार कम हो रही है।

जहां खेती की गुंजाइश पहले ही कम है, जैसे पहाड़ी इलाके, वहां से पलायन बहुत तेजी से हुआ है। ऐसे में शहरों को लोगों के रहने और रोजगार के लायक बनाना भी सरकार का दायित्व है। मगर वैश्विक पैमाने पर देखें तो हमारे शहर अनेक स्तरों पर बहुत पिछड़े हुए हैं। अतिक्रमण, अवैध कब्जे, बेतरतीब बसावट, साफ-सफाई, जल-मल निकासी आदि से जुड़ी समस्याएं दिनोंदिन गंभीर होती गई हैं। यही वजह है कि वहां आर्थिक गतिविधियां भी मंथर गति से चलती हैं। ज्यादातर लोग पारंपरिक पेशों से जुड़ कर जैसे-तैसे गुजारे लायक कमाई करके संतोष कर लेते हैं, जबकि अर्थव्यवस्था के तेज विकास के लिए नए उद्यम और बाजार के विस्तार की जरूरत है। भारत में इसकी भरपूर संभावना है, मगर इसके लिए पहले शहरों को तैयार करना होगा।

इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पिछले कुछ सालों से देशों की अर्थव्यवस्था का आकलन वहां की खुशहाली के पैमाने पर होने लगा है। खुशहाली का मतलब है कि वहां के लोगों तक स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, बुनियादी सुविधाएं आदि कितनी पहुंच पाती हैं। बताने की जरूरत नहीं कि इन मानकों पर हमारा पूरा देश ही बदहाल कहा जा सकता है। केवल कुछ इलाकों में आलीशान इमारतें खड़ी कर देने, कुछ सड़कों को बेहतर बना देने, इंटरनेट और संचार सुविधाओं का दायरा बढ़ा देने भर से खुशाहाली नहीं आ जाती। शहरों में आर्थिक गतिविधियां सुचारु बनाने के लिए इन सुविधाओं में बेहतरी के साथ-साथ आपराधिक गतिविधियों पर भी रोक लगाना बहुत जरूरी है। इस तरह जिन शहरों को सतत विकास लक्ष्य सूचकांक पर अव्वल माना गया है, वहां भी बेहतरी लाने की काफी गुंजाइश है।

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