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संपादकीयः दहशत का दायरा

कश्मीर घाटी में अब आतंकवादी संगठनों ने स्थानीय लोगों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि इस तरह वे लोगों को प्रशासन के खिलाफ और अपने पक्ष में कर सकेंगे।

Author August 13, 2018 12:42 PM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

कश्मीर घाटी में अब आतंकवादी संगठनों ने स्थानीय लोगों पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया है। उन्हें लगता है कि इस तरह वे लोगों को प्रशासन के खिलाफ और अपने पक्ष में कर सकेंगे। इसी रणनीति के तहत करीब एक महीना पहले उन्होंने दक्षिण कश्मीर के त्राल इलाके में पोस्टर निकाल कर पुलिस सेवा में काम कर रहे कश्मीरी जवानों से नौकरी छोड़ने का आह्वान किया और स्थानीय मस्जिदों से उन पुलिस जवानों के नाम घोषित किए गए जो जम्मू-कश्मीर पुलिस में भर्ती हुए हैं। जब लोगों ने उनकी इस अपील को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्होंने पुलिसकर्मियों को अगवा कर जान से मारना शुरू कर दिया। इसी दबाव का ताजा नतीजा है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के नौ विशेष पुलिस अफसरों यानी एसपीओ ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसकी घोषणा उन्होंने गांव की मस्जिदों से भी कराई। आतंकवादियों ने निश्चय ही इसे अपनी विजय के रूप में देखा होगा और उनमें विश्वास जगा होगा कि अब कश्मीरी युवक पुलिस सेवा में भर्ती होने से बचेंगे। इससे उन्हें प्रशासन पर दबाव बनाने का भी भरोसा पैदा हुआ होगा, पर इन घटनाओं से वे शायद ही स्थानीय लोगों का विश्वास जीत पाएंगे।

दरअसल, जबसे सुरक्षाबलों ने आतंकियों के खिलाफ तलाशी अभियान तेज किया है, उन्हें अपनी योजनाओं में कामयाबी मिलनी कम हुई है, बाहर से मिलने वाली वित्तीय मदद पर कड़ी नजर रखी जाने लगी है, उनके कई कमांडर मारे गए हैं, तबसे उनमें बौखलाहट पैदा हो गई है। अब वे भय के जरिए स्थानीय लोगों का सहयोग पाना चाहते हैं। कुछ महीने पहले तक वे आजादी के नाम पर और सुरक्षाबलों के खिलाफ भड़का कर युवाओं को हाथ में पत्थर लेकर सड़क पर उतारने में कामयाब हो जा रहे थे, पर अब ऐसा नहीं हो पा रहा। छिपी बात नहीं है कि जब तक स्थानीय लोगों का समर्थन नहीं मिलता, आतंकवादी संगठन अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाते। इसलिए वे सेना के हाथों मारे गए हर दहशतगर्द का महिमामंडन कर युवाओं को अपने साथ जोड़ने और स्थानीय लोगों का भावनात्मक दोहन करने का प्रयास करते रहे हैं। पर जबसे दहशतगर्दों के जनाजे में जमा होने वाली भीड़ और सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले संदेशों पर कड़ी नजर रखी जाने लगी है, वे युवाओं को गुमराह करने में कामयाब नहीं हो पा रहे। इसलिए पुलिस की नौकरी छोड़ने जैसा दबाव बनाना शुरू किया है।

हालांकि पुलिस और सेना के अधिकारी इस्तीफा दे चुके विशेष पुलिस अधिकारियों और उनके परिजनों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाने में जुटे हैं, पर फिलहाल दहशतगर्दों की दहशत उन पर तारी है। कश्मीर में लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है। बहुत सारे लोग निहायत मुफलिसी में जिंदगी बसर करते हैं। ऐसे में अगर कुछ युवाओं को सरकारी महकमे में नौकरी मिल जाती है, तो उनके पूरे परिवार का गुजारा चलता है। सरकार का भी प्रयास रहता है कि युवाओं को गुमराह होने से बचाने के लिए किसी रोजगार से जोड़ा जाए। मगर आजादी के नाम पर आतंकी संगठन हमेशा उन्हें रोजगार से वंचित रखने का प्रयास करते हैं, ताकि वे उनसे जुड़ सकें। पर अमन-चैन की जिंदगी गुजारने के ख्वाहिशमंद स्थानीय लोग कभी नहीं चाहते कि उनका बच्चा आतंक फैलाने के लिए बंदूक हाथ में ले। इसलिए आतंकियों की ये हरकतें स्थानीय लोगों में उनके प्रति नफरत ही भरेंगी।

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