संपादकीय: संकट और समाधान

भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करा कर विवादों को जन्म देना और इसकी आड़ में भारत पर दबाव बनाते रहना चीन की पुरानी रणनीति है। यह तथ्य और हकीकत तो चीन की सत्ता और सेना दोनों ही समझते हैं कि भारत के किसी भी इलाके पर कब्जा कर लेना उनके लिए अब आसान नहीं होगा।

india china tensionचीन और भारत की सेनाएं 3488 किमी लंबी एलएसी पर तीन सेक्टर्स में अपनी पोजिशन मजबूत कर रही हैं। (फाइल फोटो)

गुजरे एक महीने के दौरान पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ कर चीन ने जिस तरह की आक्रामकता दिखाई, वह अब शांत पड़ चुकी है। चीनी सैनिक पीछे हट गए हैं और अपने तंबू भी उखाड़ लिए हैं। लेकिन इस बात की क्या गांरटी है कि भविष्य में चीन अशांति पैदा करने वाली इस तरह की गतिविधियों को अंजाम नहीं देगा।

भारतीय इलाकों में चीनी सैनिकों की घुसपैठ की घटनाएं अक्सर होती रही हैं। सीमा पर उपजे तनाव के हालिया मामले को सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर सुलझाने के प्रयासों के तहत ही पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शनिवार को दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों में वार्ता हुई। हालांकि यह शुरूआती बैठक है और इससे कोई नतीजे निकालना जल्दबाजी ही होगी। लेकिन सीमा पर जिस तरह के हालात बन गए थे, उसे देखते हुए शांति स्थापित करने के लिए इस तरह के सैन्य और कूटनीतिक स्तर के प्रयास जरूरी इसलिए हो जाते हैं, ताकि मामला गंभीर रूप धारण न कर ले। स्थिति को बिगाड़ने के लिए चीन ने तो अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करा कर विवादों को जन्म देना और इसकी आड़ में भारत पर दबाव बनाते रहना चीन की पुरानी रणनीति है। यह तथ्य और हकीकत तो चीन की सत्ता और सेना दोनों ही समझते हैं कि भारत के किसी भी इलाके पर कब्जा कर लेना उनके लिए अब आसान नहीं होगा। भारत अब 1962 वाला देश नहीं है।

चीन की तरह ही भारत भी परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है। दरअसल, भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ जैसी गतिविधियां इन इलाकों में भारत द्वारा किए जा रहे ढांचागत विकास के विरोध का प्रतीक हैं। भारतीय सेना ने सीमाई इलाकों में जिस तरह का मजबूत बुनियादी ढांचा खड़ा कर लिया है, सड़के बना ली हैं, हैलीपैड बना लिए हैं, उनसे चीन की नींद उड़ी हुई है। पैंगोंग त्सो झील के पास फिंगर क्षेत्र में भारत ने सामरिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण सड़क बना ली है और अभी यही बात चीन को खटक रही है। मौजूदा विवाद का मूल इसी में है।

गलवान घाटी में दरबुक-शायोग-दौलत बेग ओल्डी मार्ग को जोड़ने वाली एक सड़क को लेकर भी चीन बौखलाया हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सीमा विवाद के चलते भारत और चीन के बीच एक-एक इंच जमीन का महत्त्व है। जैसे चीन अपनी जमीन नहीं छोड़ सकता, वैसे ही भारत भी अपना हिस्सा नहीं छोड़ेगा। तथ्य तो यह है कि सीमाई क्षेत्र में भारत ने जितने भी सामरिक निर्माण किए हैं, वे अपने क्षेत्र में किए हैं, न कि चीन के इलाके में जाकर। अगर भारत भी चीन की तहह घुसपैठ जैसी हरकतें करता तो क्या चीन अब तक चुप बैठता!

विवाद शांत करने के लिए भले कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर प्रयास चलते रहें, लेकिन इतना निश्चित है कि यह कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं है। चीन एक तरफ सदियों पुराने संबंधों की दुहाई देता है, भारत से शांति और सदभाव की अपेक्षा रखता है, भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देखता है जो उसकी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए सबसे जरूरी है, लेकिन फिर भी इस तरह के विवादों को खड़ा कर हर बार वैमनस्यता को जन्म देता है, जो उसकी दोस्ती का सबसे विरोधाभासी रूप है। अड़तीस सौ किलोमीटर लंबी सीमा का विवाद शांति और तार्किक तरीके से ही निकल पाएगा। घुसपैठ जैसी गतिविधियों से तो शांति के प्रयासों को धक्का ही पहुंचता है।

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