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संपादकीयः बेकाबू बोल

भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर चल रहे गतिरोध को कोई दो महीने होने जा रहे हैं। इस बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बेजिंग हो आए हैं।
Author August 11, 2017 02:52 am
चीन की व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं है, इसलिए वहां स्वतंत्र मीडिया का वजूद नहीं है। मीडिया को सरकार के प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण या निर्देशन में काम करना पड़ता है।

भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर चल रहे गतिरोध को कोई दो महीने होने जा रहे हैं। इस बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बेजिंग हो आए हैं। चीनी नेतृत्व से इस मसले पर सीधी बातचीत का यह पहला मौका था। पर अब तक कोई हल नहीं निकल सका है। दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर सख्ती से कायम हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा नागवार गुजरने वाला कुछ रहा है तो वह है चीनी मीडिया का रवैया। चीन की व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं है, इसलिए वहां स्वतंत्र मीडिया का वजूद नहीं है। मीडिया को सरकार के प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण या निर्देशन में काम करना पड़ता है। इसलिए ‘पीपुल्स डेली’, ‘शिनहुआ’ और ‘ग्लोबल टाइम्स’ को चीन सरकार के आधिकारिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करने वाला माना जाता है। पीपुल्स डेली और शिनहुआ, सीधे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से निर्देशित होते हैं, जबकि ग्लोबल टाइम्स अर्ध-सरकारी है, और खासकर इसके जरिए ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन सरकार की सोच का अंदाजा लगाता है। ये पत्र जब अपनी सरकार के नजरिए से इतने बंधे हैं, तो उन्हें संयम और जिम्मेदाराना ढंग से पेश आना चाहिए। लेकिन डोकलाम विवाद शुरू होने के बाद से ये अखबार जो कुछ छापते रहे हैं उसे भड़काऊ प्रोपेगेंडा ही कहा जा सकता है, मीडिया का काम नहीं। भारत को लक्ष्य कर आए दिन धमकियां छापी गर्इं, सबक सिखाने के अंदाज में।

जिन दिनों दोनों देशों की सरकार की तरफ से खामोशी बरती गई, या संभल-संभल कर बयान दिए, उन दिनों भी चीनी मीडिया ने जहर उगलना जारी रखा। दोनों देशों की तीन हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी सीमा के एक बहुतछोटे-से इलाके के विवाद को ग्लोबल टाइम्स ने किस हद तक ले जाने की कोशिश की, इसका उदाहरण नौ जुलाई के उसके अंक में छपे एक लेख से लगाया जा सकता है। इस लेख में यह सुझाया या चेताया गया है कि पाकिस्तान के अनुरोध पर तीसरे देश की सेना कश्मीर में प्रवेश कर सकती है। समझा जा सकता है कि यहां ‘तीसरे देश से’ मतलब चीन से ही होगा। अपने पाठकों को जागरूक करने के नाम पर चीनी मीडिया ने भारत को केवल अतिक्रमणकारी के रूप में चित्रित किया, न डोकलाम पर भूटान के दावे के बारे में कुछ बताया न भारत-भूटान संधि के बारे में। यह सही है कि डोकलाम-गतिरोध शुरू होने के बाद से चीनी मीडिया भारत के प्रति आक्रामक तेवर अख्तियार किए हुए है, पर उसके इस रवैए के पीछे कुछ और वजह भी हो सकती है।

जापान, विएतनाम और आस्ट्रेलिया से भारत की बढ़ती नजदीकी और ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रति के भारत का पूर्ण बहिष्कार और अपनी इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना के तहत छोटे देशों के कर्ज में डूब जाने के खतरों के प्रति भारत का आगाह करना भी चीनी नेतृत्व को रास नहीं आया। पर ये सब तो ऐसी बातें हैं जिनका कूटनीतिक जवाब ही दिया जाता है, या दिया जाना चाहिए। मीडिया का अपनी तरफ से निंदा-अभियान चलाना और धमकी भरी टिप्पणियां छापना बेतुका और गैरजरूरी है। यह गौरतलब है कि डोकलाम-गतिरोध के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मीडिया का रुख कुल मिलाकर भारत के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा है। पर यह भी चीनी मीडिया को हजम नहीं हुआ; उसने भारत के प्रति सहानुभूति भरा रवैया दिखाने के लिए पश्चिमी मीडिया को भी खरी-खोटी सुनाई है। चीन में सोशल मीडिया ने भी जंग का माहौल बनाने की कोशिश की है। अच्छा यही होगा कि डोकलाम-गतिरोध का हल बातचीत से ही निकाला जाए। मीडिया चाहे सरकार के अधीन हो या स्वतंत्र, उसका दायित्व इस संभावना को चोट पहुंचाना नहीं होना चाहिए।

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