ताज़ा खबर
 

संपादकीय: तनाव की सीमा

चीन की साम्राज्यवादी नीतियां भी किसी से छिपी नहीं हैं। वह भारत पर अपना दबदबा बनाने की मंशा से जब-तब इससे सटे देशों को उकसाने का प्रयास करता रहा है। इस बार उसने नेपाल को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया है।

Author Published on: May 21, 2020 12:17 AM
चीन की साजिश में फंसकर नेपाल भारत विरोधी कार्यों में जुटा है।

एक बार फिर लद्दाख और सिक्किम क्षेत्र में भारत और चीन के बीच गैर-चिह्नित सीमा पर तनाव बढ़ गया है। दोनों देशों ने अपनी सेनाओं की अतिरिक्त टुकड़ियां भेज दी हैं। इस बार इस तनाव को गंभीर माना जा रहा है। हालांकि इस क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। चीन की साम्राज्यवादी नीतियां भी किसी से छिपी नहीं हैं। वह भारत पर अपना दबदबा बनाने की मंशा से जब-तब इससे सटे देशों को उकसाने का प्रयास करता रहा है। इस बार उसने नेपाल को अपने पक्ष में खड़ा कर लिया है।

नेपाल, सिक्किम और भूटान के भारत से सटे हिस्से चीन के लिए सामरिक दृष्टि से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। इसीलिए उसने डोकलाम में सड़क निर्माण शुरू किया था, ताकि उसकी भारत के पूर्वोत्तर हिस्सों तक पहुंच आसान हो और भारतीय सैनिकों की निगरानी को कमजोर किया जा सके। पर जब भूटान ने इसका विरोध किया तो भारत ने भी चीन को सख्त चेतावनी दी। तब भी तनातनी बढ़ी थी और आखिरकार चीन को अपने कदम वापस खींचने पड़े थे।

मगर जब भारत ने जम्मू-कश्मीर को तीन हिस्सों में बांट कर नया नक्शा पेश किया तो उसमें कालापानी क्षेत्र को भी भारत का हिस्सा दिखाया। इस पर नेपाल ने उसे अपना हिस्सा बताते हुए एतराज जताया और लिपुलेख दर्रे में बन रही भारतीय सड़क का भी विरोध किया। इस महीने के पहले हफ्ते में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उस सड़क का उद्घाटन करने के बाद उस पर वाहनों का पहला जत्था भी रवाना कर दिया। उसके बाद नेपाल की तल्खी और बढ़ गई।

उसने चीन से गुहार लगाई कि वह लिपुलेख क्षेत्र में भारत की गतिविधियों को रोकने में मदद करे। हालांकि चीन ने ऊपरी तौर पर बयान दिया कि यह भारत और नेपाल के बीच का आपसी मामला है और उन्हें आपस में बातचीत के जरिए इसका हल निकालना चाहिए। मगर लद्दाख और सिक्किम क्षेत्र में उसने जिस तरह अपनी सैन्य टुकड़ियां भेजी हैं और उन्हें भारतीय सैनिकों के साथ संघर्ष भी किया है, उससे चीन की नीयत समझी जा सकती है।

दरअसल, नेपाल के लिपुलेख और सिक्किम में भारत की सड़कें बन जाने से भारतीय सेना की चीन सीमा तक आवाजाही सुगम हो जाएगी, इसलिए उसने नेपाल को उकसा कर इस पर विवाद खड़ा करने का प्रयास किया। जबकि लिपुलेख दर्रे में भारत के सड़क निर्माण को लेकर नेपाल के साथ बहुत पहले समझौता हो चुका था, मगर वहां के वर्तमान प्रधानमंत्री अब उस समझौते को बदलने पर अड़े हैं।

भारत के प्रति नेपाल के इस बदले रुख को समझना मुश्किल नहीं है। चीन ने वहां सड़क, रेल, बिजली आदि विकास परियोजनाओं में काफी मदद की है और नेपाल को लगता है कि वह भारत के बजाय चीन से दोस्ती बढ़ा कर ज्यादा फायदे में रह सकता है। इसलिए वह चीन की रणनीतियों में उसकी मदद कर रहा है। पर चीन को शायद ही इसका कोई बड़ा लाभ मिल पाए।

नेपाल में ऐसी क्षमता नहीं है कि वह भारत के खिलाफ देर तक चीन का साथ दे पाए। फिर नेपाल अनेक समझौतों से भारत के साथ बंधा है, उन्हें तोड़ना उसके लिए आसान नहीं होगा। इसके अलावा सिक्किम और भूटान से सटे क्षेत्रों में भारत की स्थिति ज्यादा मजबूत है, जहां से चीन को पहले भी कड़ी चुनौतियां मिलती रही हैं। सीमा पर चीन की ताजा सैन्य सक्रियता भी महज कवायद साबित होने वाली है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीय: साख और जांच
2 संपादकीय: महामारी की मार
3 संपादकीय: असुरक्षित दूरी