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संपादकीयः चीन की चाल

दरअसल, सोमवार को चीन के विदेश मंत्री ने एक बयान में कहा था कि वह 1959 में चीन की सरकार की ओर से प्रस्तावित वास्तविक नियंत्रण रेखा या एलएसी को मानता है।

भारत और चीन के बीच इस साल मई से ही लद्दाख स्थित एलएसी पर तनाव जारी है। (फाइल फोटो)

पिछले करीब पांच महीने से लद्दाख क्षेत्र में चल रहे विवाद के बीच चीन की ओर से जिस तरह की हरकतें जारी हैं, उससे साफ है कि उसकी मंशा समस्या को सुलझाने की कम, उसे और जटिल शक्ल देने की ज्यादा है। ऐसा लगता है कि किसी परोक्ष कारण से चीन या तो दुनिया का ध्यान दूसरी ओर भटकाए रखना चाहता है या फिर भारत की सहजता और शांति के लिए प्रतिबद्धता का फायदा उठा कर जबरन अतिक्रमण की कोशिश में लगा हुआ है। हालांकि ऐसे हर मौके पर भारत ने चीन के सामने बिल्कुल स्पष्ट तौर पर यह जता दिया है कि बेजा दखल की ऐसी कोशिशों को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कई महीने से लद्दाख के इलाके में सीमा क्षेत्र का विवाद खड़ा करने के मकसद से चीन की ओर से किस तरह की अवांछित गतिविधियां जारी हैं और आपत्ति उठाने पर उसने कैसा रुख अख्तियार किया है। यों सैन्य मोर्चे से लेकर कूटनीतिक स्तर पर भारत ने इसका सख्त और उचित जवाब दिया है, लेकिन चीन शायद किसी ऐसी आदत का शिकार हो गया लगता है, जिसके तहत वह विवाद और तनाव के हालात को बनाए रखना चाहता है।

दरअसल, सोमवार को चीन के विदेश मंत्री ने एक बयान में कहा था कि वह 1959 में चीन की सरकार की ओर से प्रस्तावित वास्तविक नियंत्रण रेखा या एलएसी को मानता है। चीन के इस बयान में एक तरह की मनमर्जी है, जिसमें वह अपने एकतरफा प्रस्ताव को अंतिम मानता है और उसकी नजर में दूसरे पक्ष की राय या प्रतिक्रिया की कोई अहमियत नहीं है। कोई भी संप्रभु देश खासतौर पर सीमा से संबंधित किसी बेमानी प्रस्ताव की ऐेसी एकतरफा व्याख्या को स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए स्वाभाविक ही भारत ने इस मसले पर सख्त प्रतिक्रिया दी है और चीन के इस रुख को सिरे से खारिज कर दिया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा कि भारत ने 1959 में एकतरफा रूप से परिभाषित तथाकथित वास्तविक नियंत्रण रेखा को कभी स्वीकार नहीं किया है और चीन सहित सभी अंतरराष्ट्रीय पक्ष इस बारे में जानते हैं। इसके साथ ही यह उम्मीद की गई है कि पड़ोसी देश तथाकथित सीमा की अपुष्ट एकतरफा व्याख्या करने से बचेगा।

हालांकि लद्दाख को लेकर चीन ने जिस तरह का रवैया अपनाया हुआ है, वह उसकी मंशा को बताने के लिए काफी है, लेकिन ऐसा लगता है कि अब वह अपने अतिक्रमण का दायरा और विस्तृत करने की कोशिश में है या फिर विवाद की स्थिति बनाए रखना चाहता है। सवाल है कि आखिर चीन क्यों ऐसे मसले छेड़ रहा है, जिसका न केवल कोई आधार नहीं है, बल्कि इससे हालात और जटिल ही होंगे। अब ये खबरें किसी तरह बाहर आने लगी हैं कि चीन अपने यहां खाद्यान्न संकट जैसे हालात से दुनिया का ध्यान हटाने के लिए पड़ोसी देशों से संबंधित सीमा विवाद को नए सिरे से उलझाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन अपनी इन हरकतों के सहारे अपनी आंतरिक समस्याओं से कैसे निजात पा सकेगा? विडंबना यह है कि इस मसले पर 1993 और इसके बाद कई द्विपक्षीय समझौतों का खयाल रखना भी चीन को जरूरी नहीं लग रहा है। यों उसका यह रुख उसकी कथनी और करनी में फर्क के चेहरे के अनुकूल है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अपने इस रवैये के सहारे अगर चीन की मंशा गैरजरूरी विस्तारवाद के जरिए दूसरे देशों की सीमाओं का अतिक्रमण करना है तो भारत इसे किसी भी हाल में कामयाब नहीं होने देगा।

 

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