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संपादकीय: चीन की बौखलाहट

जून में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमले की घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा सहित पूरे क्षेत्र में भारत ने जिस तेजी से सैन्य तैयारियां की हैं, उससे भी चीन बौखलाया हुआ तो है। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में भारतीय नौसेना के युद्धपोत की तैनाती से उसकी नींद उड़ी हुई है।

भारत के साथ चीन का रवैया पड़ोसी वाला नहींं। भारत को इसका मुकाबला करना होगा। विशेषज्ञों लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) एचएस पनाग (बाएं) और पी स्टॉबडन, पूर्व राजदूत (दाएं) का ऐसा मानना है।

पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो क्षेत्र में 29-30 अगस्त की रात चीनी सैनिकों ने फिर से कब्जे की जो नाकाम कोशिश की है, उससे यह साफ है कि चीन भारत को उकसाने और किसी न किसी तरह से युद्ध के हालात पैदा करने में लगा है। पिछले ढाई महीने में यह दूसरा मौका है जब भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच टकराव हुआ है।

15-16 जून की रात भी चीनी सैनिक सुनियोजित तरीके से भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे और भारतीय सैनिकों पर हमला कर दिया था। अब फिर चीनी सैनिकों ने पैंगोंग त्सो पर कब्जा करने की कोशिश की, लेकिन इस बार मुंह की खानी पड़ी। भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों के इस हमले को पूरी तरह से नाकाम कर दिया। चीन का रवैया इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वह भारत के साथ अपना सीमा विवाद हल नहीं करना चाहता, बल्कि उसकी मंशा नए-नए विवादों को जन्म देकर भारत को उलझाए रखने की है।

जून की घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाने और पांच मई के पूर्व की स्थिति बहाल करने के लिए दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर वार्ताओं के दौर चल रहे हैं। लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला है। वार्ताओं के अब तक जितने भी दौर हुए, उनमें पहली सहमति यही बनी कि अब किसी भी पक्ष की ओर से ऐसी कोई गतिविधि नहीं होगी, जिससे तनावपूर्ण हालात पैदा हों।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच भी फोन पर हुई बातचीत के बाद छह जुलाई को दोनों पक्षों की ओर से पीछे हटने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। तब चीनी सैनिकों ने अपने तंबू हटाते हुए पीछे हटाने का संकेत दिया भी था। लेकिन यह प्रक्रिया मध्य जुलाई से आगे नहीं बढ़ी है। हैरानी की बात तो यह है कि जब बातचीत के दौर चल रहे हैं, तब भी चीन इस तरह की भड़काऊ गतिविधियों को अंजाम देने में लगा है।

चीन की ओर से होने वाले ये हमले बता रहे हैं कि उसके लिए बातचीत की कोई अहमियत नहीं है। वह इस तरह के हमले करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ने, कब्जे करने और नए-नए इलाकों को विवादित बनाने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है। लेकिन चीन को अब यह समझ जाना चाहिए कि अगर उसने सैन्य और कूटनीतिक स्तरों पर हुई वार्ता के दौरान बनी सहमति का उल्लंघन किया और फिर से कब्जे की कोशिशें की, तो भारत की सेना उसे उसी की भाषा में जवाब देने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जून में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हमले की घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा सहित पूरे क्षेत्र में भारत ने जिस तेजी से सैन्य तैयारियां की हैं, उससे भी चीन बौखलाया हुआ तो है। इसके अलावा दक्षिण चीन सागर में भारतीय नौसेना के युद्धपोत की तैनाती से उसकी नींद उड़ी हुई है।

इसीलिए उसने दो दिन पहले पैंगोंग त्सो में फिर से कब्जे की हरकत की। भारत अपनी ओर से किसी भी तरह की ऐसी कोई कार्रवाई नहीं चाहता, जिससे युद्ध की नौबत आए। इसीलिए वह ऐसे प्रयास कर रहा है जिससे चीनी सैनिक वापस अपने इलाकों में लौट जाएं और पांच मई से पहले वाली स्थिति बहाल हो जाए। लेकिन अगर चीन अपने रास्ते पर चलता रहा, तो भारत के पास सारे विकल्प खुले हुए हैं और पिछले दिनों रक्षा सेवाओं के प्रमुख जनरल बिपिन रावत इस बारे में चीन को साफ-साफ संदेश दे भी चुके हैं।

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