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संपादकीयः सहमति और दरार

ब्रिक्स के ताजा घोषणापत्र में कई बातें ऐसी हैं जो भारत के रुख का समर्थन करती हैं।
Author October 18, 2016 03:22 am
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

ब्रिक्स के ताजा घोषणापत्र में कई बातें ऐसी हैं जो भारत के रुख का समर्थन करती हैं। मसलन, आतंकवाद हर हाल में निंदनीय है, चाहे उसका स्वरूप कुछ भी क्यों न हो; और इसके साथ ही घोषणापत्र में सभी देशों का आह्वान किया गया है कि वे अपनी जमीन से कोई आतंकवादी कृत्य न होने दें। भारत के लिए उत्साह बढ़ाने वाली दूसरी खास बात यह है कि सीसीआइटी यानी अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को रोकने के लिए प्रस्तावित वैश्विक संधि का संयुक्त राष्ट्र महासभा में अनुमोदन करने का आह्वान किया गया है। इस संधि का जिक्र ब्रिक्स के 2014 के घोषणापत्र में था, पर पिछले साल रूस के ऊफा शहर में हुए शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र में इसका उल्लेख जाने क्यों नहीं था। भारत के जोरदार आग्रह का ही नतीजा रहा होगा कि इसे फिर से शामिल करना पड़ा। दरअसल, जी-20 और आसियान तथा पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह पाकिस्तान का बगैर नाम लिये उसे घेरने की रणनीति अख्तियार की थी, वही सिलसिला उन्होंने ब्रिक्स में भी जारी रखा।

रविवार को उन्होंने कहा कि भारत के पड़ोस में एक देश है जो आतंकवाद का स्रोत है और यह आतंकवाद सिर्फ भारत के लिए नहीं, सारी दुनिया के लिए खतरा है, और इसलिए ब्रिक्स को एक स्वर से इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। ब्रिक्स ने आवाज उठाई भी, जैसा कि गोवा घोषणापत्र से जाहिर है, पर इस सहमति की सीमा है। घोषणापत्र पर बारीकी से गौर करें तो दरारें दिख जाती हैं। मसलन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपने संबोधन में आतंकवाद पर चिंता जताने के साथ-साथ यह भी कहा कि क्षेत्रीय उपद्रवों का राजनीतिक समाधान तलाशा जाना चाहिए। क्या यह बिना नाम लिये कश्मीर की तरफ इशारा था? गोवा घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का भी जिक्र है और इस्लामिक स्टेट, अलकायदा तथा सीरिया के जुभात अल-नुसरा जैसे आतंकी संगठनों का भी, लेकिन न तो कहीं लश्कर-ए-तैयबा का उल्लेख है न जैश-ए-मोहम्मद का। बल्कि जैश के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के भारत के प्रस्ताव को हाल में चीन दो बार पलीता लगा चुका है।

रूस से भारत की मित्रता पुरानी है, पर अब इसमें पहले जैसी प्रगाढ़ता नहीं, जिसका अंदाजा पिछले दिनों पाकिस्तान और रूस के साझा सैन्य अभ्यास से भी लगाया जा सकता है। अलबत्ता रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने इशारों में भी वैसा कुछ नहीं कहा जैसा चीन के राष्ट्रपति ने कहा, पर उन्होंने पाकिस्तान की नाराजगी मोल लेने से बचने की सावधानी भी बरती। ब्रिक्स भले पांच देशों का समूह है और सभी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश हैं, मगर इस बार सारी दुनिया की नजर भारत, चीन और रूस पर ही थी। मोदी सरकार के कूटनीतिक उत्साह के चलते यह पहले से अनुमान था कि आतंकवाद इस बार ब्रिक्स का खास मुद््दा होगा। वैसा हुआ भी। लेकिन सीधे पाकिस्तान को घेरने की रणनीति में मोदी को शी का साथ नहीं मिला। बल्कि आतंकवाद को लेकर कई जगह दोनों नेताओं के बयानों के निहितार्थ विरोधाभासी थे। यही नहीं, ब्रिक्स के गोवा सम्मेलन का समापन होते ही, चीन के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर यह भी कह दिया कि हालांकि उनका देश हर तरह के आतंकवाद के खिलाफ है, पर वह किसी देश या धर्म को आतंकवाद से जोड़े जाने के भी खिलाफ है। और यही नहीं, इस बयान में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान ने खुद आतंकवाद से लड़ने में कुर्बानियां दी हैं और वह चीन का सदाबहार दोस्त है। सतह पर बनी सहमति में दरार को उजागर करने के लिए और क्या कसर बाकी रह जाती है!

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  1. B
    babloo
    Oct 18, 2016 at 10:42 am
    फिर फालतू फेंकते रहने से क्या फायदा ..क्यों उल्लू पे उल्लू बनाये जा रहा है तू
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    Reply