सरकार के तमाम दावों के बावजूद देश में बाल तस्करी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इसका जाल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि सीमा पार तक फैला हुआ है। विभिन्न राज्यों में सक्रिय गिरोह छोटे बच्चों से लेकर नवजात शिशुओं का अपहरण करते हैं और बाद में उनकी खरीद-फरोख्त की जाती है। हैरत इस बात की है कि इन आपराधिक गतिविधियों में ऐसे लोगों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जो लोगों का जीवन बचाने के पेशे से जुड़े हुए हैं।

दिल्ली में गुरुवार को बाल तस्करी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश होना बड़ी सांठगांठ की ओर इशारा करता है। पुलिस का दावा है कि इस गिरोह में एक चिकित्सक एवं अस्पताल का मालिक भी शामिल है, जो नि:संतान दंपतियों में से संभावित खरीदारों की पहचान करता था। अगर देश की राजधानी के किसी अस्पताल में ही इस तरह की आपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है, तो दूसरे शहरों में कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

सवाल है कि मानव तस्करी के खिलाफ सख्त कानून के बावजूद इससे जुड़े गिरोह आसानी से बच्चों का अपहरण कर उनकी खरीद-फरोख्त कैसे करते हैं? इसमें दोराय नहीं कि यह पुलिस व्यवस्था और निगरानी तंत्र की लापरवाही और कर्तव्य में कोताही का ही नतीजा है। दिल्ली पुलिस ने बाल तस्करी में जिन तेरह आरोपियों को गिरफ्तार किया है, वे काफी समय से विभिन्न राज्यों में सक्रिय थे। वे बच्चों का अपहरण कर उन्हें दिल्ली लाते थे और यहां एक निजी अस्पताल में उन्हें रखा जाता था। पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह पिछले डेढ़ साल में तीस से अधिक बच्चों को बेच चुका है।

सवाल यह भी कि पुलिस को इस गिरोह की भनक पहले क्यों नहीं लग पाई? क्या पुलिस का निगरानी एवं खुफिया तंत्र इतना कमजोर है कि उसे अस्पताल जैसे सार्वजनिक संस्थानों में चल रही आपराधिक गतिविधियों की भी जानकारी नहीं मिल पाती है? जाहिर है कि जब तक पुलिस प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक किसी भी तरह के अपराध पर अंकुश नहीं लग पाएगा।