इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिन नौनिहालों को हम देश का भविष्य मानते हैं, उनमें से बहुत सारे बच्चे आज बहुस्तरीय जोखिम के बीच से गुजर रहे हैं। बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों के अनेक रूप के अलावा बाल तस्करी का संजाल आज इस कदर जटिल होता जा रहा है कि इससे निपटना सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। हालांकि इस अपराध को काबू में करना और बच्चों को इस खतरे से बचाना सरकार की अनिवार्य जिम्मेदारी और सबसे ऊपर की प्राथमिकता में दर्ज होना चाहिए। मगर हालत यह है कि देश के सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देना पड़ रहा है कि वे बच्चों के खिलाफ इस अपराध को गंभीरता से लें।

गौरतलब है कि बुधवार को एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने देश में बाल तस्करी के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताई और कहा कि संगठित गिरोह देशभर में सक्रिय हैं और अगर राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों ने तुरंत प्रभावी कदम नहीं उठाए, तो स्थिति बेकाबू हो सकती है।

हैरानी की बात यह है कि बाल तस्करी के फैलते जाल पर शीर्ष अदालत के सख्त रुख के बावजूद कई राज्यों ने अब तक न जरूरी रपट तैयार की है और न ही समितियां बनाई हैं। समस्या की गंभीरता को देखते हुए स्वाभाविक ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के लापरवाह रवैये पर नाराजगी जताई। दरअसल, करीब एक वर्ष पहले अदालत ने अपने एक फैसले में संगठित तस्करी के जाल को तोड़ने के लिए कई संस्थागत सुधारों के निर्देश दिए थे। इनमें तस्करी के मामलों में छह महीने के भीतर हर रोज सुनवाई करना, मानव तस्करी रोधी इकाइयों को मजबूत करना और जांच प्रक्रिया में सुधार करना शामिल था।

अदालत ने राज्यों को यह निर्देश दिया था कि वे तस्करी के संभावित संवेदनशील स्थानों की पहचान और निगरानी के लिए राज्यस्तरीय समितियां बनाएं और लापता बच्चों के मामलों को तस्करी मान कर जांच शुरू करें। मगर इस मुद्दे पर राज्य सरकारों के रुख का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कई राज्यों ने अभी तक तय प्रारूप में रपट तक दाखिल नहीं की है। सरकारी तंत्र में इस इच्छाशक्ति के अभाव और उदासीनता की वजह क्या यह है कि जो बच्चे तस्करी का शिकार हो जाते हैं, उनमें ज्यादातर समाज के गरीब और कमजोर तबके से आते हैं?

यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि देश में बाल तस्करी का संकट पिछले कुछ वर्षों के दौरान कितना गहरा गया है। खासतौर पर कोविड महामारी के बाद बच्चों के लापता होने के मामलों में काफी तेजी दर्ज की गई। बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश की स्थिति ज्यादा गंभीर है। सही है कि लापता होने वाले तमाम बच्चों में से कइयों को पुलिस खोज लेती है, लेकिन उनमें से बहुतों की कोई खबर नहीं मिलती। सवाल है कि जिन बच्चों को नहीं खोजा जा पाता, वे कहां जाते हैं और उनके साथ क्या होता है।

यह समझना मुश्किल नहीं है कि देश भर में जो बच्चे गायब हो जाते हैं, उन्हें बाल मजदूरी से लेकर यौन शोषण और अपराध की दुनिया के अंतहीन दलदल में झोंक दिया जाता है। एक परिवार अपने बच्चे के लापता होने के बाद किस दंश और दुख से गुजरता है, यह शायद बताने की जरूरत नहीं है। मगर कोई भी समाज और सत्ता बच्चों की तस्करी के मुद्दे को लेकर अगर गंभीर नहीं है, तो यह एक तरह से अपने ही भविष्य की त्रासदी को नजरअंदाज करना है।

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मुंबई में पिछले कुछ महीनो के दौरान एक डिजिटल टूल के दम पर पुलिस अपराधियों से लेकर गायब बच्चों तक को ढूंढने में कामयाब रही है। पुर्तगाल की एक टूरिस्ट का पीछा करने और परेशान करने के मामले में दो लोग पिछले महीने गिरफ्तार हुए। गोरेगांव से गायब होने वाले 14 साल के एक बच्चा कुछ सप्ताह पहले राजस्थान में मिला। जनवरी में मुंबई के एक प्रोफेसर को चाकू मारने वाले शख्स को दो दिन में पकड़ लिया गया। इसके अलावा एक साल पहले अभिनेता सैफ अली खान पर हमला करने वाले शख्स को भी कुछ दिनों बाद पकड़ लिया गया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक