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तारीखों का चुनाव

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें तय कर दी गई हैं। पूरा चुनाव करीब एक महीना चलेगा और नतीजे आने में एक महीने से कुछ अधिक समय लगेगा।

Bengalमुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी। फाइल फोटो।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखें तय कर दी गई हैं। पूरा चुनाव करीब एक महीना चलेगा और नतीजे आने में एक महीने से कुछ अधिक समय लगेगा। सत्ताईस मार्च को पहला और उनतीस अप्रैल को आखिरी मतदान होगा। मतों की गणना दो मई को होगी। केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में एक ही दिन मतदान होगा। असम में तीन चरण में वोट पड़ेंगे और पश्चिम बंगाल में मतदान आठ चरणों में संपन्न होगा। इसे लेकर स्वाभाविक ही सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग पर सीधा हमला बोलते हुए पूछा है कि क्या ये तारीखें उसने भाजपा की योजनाओं को ध्यान में रख कर तय की हैं। ऐसी क्या अड़चन थी, जिसके चलते दक्षिण परगना जिले में तीन चरण में चुनाव कराने पड़ रहे हैं। इसके पहले पश्चिम बंगाल में दो चुनाव सात चरणों में संपन्न कराए गए थे। निर्वाचन आयोग ने इसके पीछे सुरक्षा व्यवस्था को बड़ा कारण बताया है। केंद्रीय रिजर्व बल की करीब सवा सौ बटालियनें वहां तैनात करने की योजना है। इसके अलावा सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों के बंटवारे के लिए एक समिति भी गठित की जा रही है।

छिपी बात नहीं है कि पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा की घटनाएं होती हैं। चुनाव की तारीखें घोषित होने के बहुत पहले से ही राजनीतिक दलों ने अपना प्रचार अभियान तेज कर दिया था और उसमें अक्सर भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें देखी गई हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी निर्वाचन आयोग के अनुभव कुछ अच्छे नहीं हैं। इसलिए उसका सावधानी बरतना समझा जा सकता है। मगर फिर भी निर्वाचन अयोग के सामने यह सवाल बना रहेगा कि वह चुनावों की अवधि को समेट क्यों नहीं पा रहा।

सीटों के लिहाज से देखें तो तमिलनाडु की विधानसभा सीटें पश्चिम बंगाल से कुछ ही कम हैं। जब तमिलनाडु में एक दिन में मतदान कराए जा सकते हैं, तो पश्चिम बंगाल में आठ चरण में कराने से क्यों नहीं बचा गया। चुनाव की अवधि कम करने पर लंबे समय से जोर दिया जाता रहा है। इसकी कई वजहें हैं। एक तो यह कि जब भी चुनाव लंबे समय तक खिंचता है, उसमें निष्पक्ष मतदान की संभावना क्षीण होती जाती है, क्योंकि राजनीतिक दलों को मतदाताओं को प्रलोभित-प्रभावित करने का समय अधिक मिल जाता है। फिर आचार संहित के पालन को लेकर भी सवाल उठने लगते हैं। देखा जाता है कि ज्यादा चरणों में चुनाव होने की वजह से एक ही जिले के एक हिस्से में मतदान हो रहा होता है और उसी दिन दूसरे हिस्से में राजनेता अपनी रैलियां निकाल रहे होते हैं। पश्चिम बंगाल में भी यही होगा।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात कि चुनाव की अवधि जितनी लंबी होती है, उस पर खर्च भी उतना ही बढ़ जाता है। इतने समय तक सुरक्षा बलों की तैनाती और दूसरी व्यवस्थाओं पर खर्च बढ़ जाएगा। जब आमचुनाव के समय पूरे देश में एक साथ मतदान कराए जाते हैं, तब भी सुरक्षा व्यवस्था का ध्यान रखना पड़ता है। विधानसभा चुनाव में क्षेत्र छोटा होता है, इसलिए उसमें सुरक्षाबलों की कमी समझ से परे है। फिर जिन राज्यों में मतदान छह अप्रैल को संपन्न हो जाएंगे, उन्हें भी नतीजों के लिए करीब महीने भर तक इंतजार करना पड़ेगा। इतने दिनों तक वोटिंग मशीनों की सुरक्षा पर जो खर्च बैठेगा, सो अलग। इसलिए कम से कम दिनों में चुनाव कराने की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।

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