वजनी जीत

ओलंपिक के पहले दिन ही भारोत्तोलन में साईखोम मीराबाई चानू ने भारत का सिर ऊंचा कर दिया।

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मीराबाई चानू ! फाइल फोटो।

ओलंपिक के पहले दिन ही भारोत्तोलन में साईखोम मीराबाई चानू ने भारत का सिर ऊंचा कर दिया। देश और चानू के लिए यह हासिल मामूली नहीं है। देश के लिए इसलिए कि दो दशक बाद भारोत्तोलन में कोई पदक मिला। और चानू के लिए इसलिए कि 2016 के रियो ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीत पाने के बाद भी उन्होंने जरा हिम्मत नहीं हारी और जज्बा बनाए रखा। अब चानू सिर्फ एक खिलाड़ी ही नहीं हैं, बल्कि वे लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन गई हैं। चानू से पहले 2000 में सिडनी ओलंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीता था। यानी भारोत्तोलन में भारत को पहला रजत पदक दिलाने वाली चानू पहली महिला खिलाड़ी भी बन गई हैं। चानू की उपलब्धि पर इसलिए भी गौर करना जरूरी है कि वे जिस ग्रामीण पृष्ठभूमि से आती हैं वहां खेलों में भविष्य बनाने का सपना भी आसानी से कोई देख नहीं पाता। पर बचपन से ही वजन उठाने की ताकत रखने वाली चानू की इस प्रतिभा को परिवार ने पहचान लिया था और उन्हें हर तरह से आगे बढ़ाया। तभी चानू ओलंपिक के मुकाम तक पहुंचीं। भारोत्तोलन प्रशिक्षण के लिए जिस तरह का संघर्ष चानू को करना पड़ा, वही उनकी कामयाबी की सीढ़ी भी बना।

ओलंपिक में भारत की इस जोरदार शुरूआत से यह साबित हो गया कि अगर खिलाड़ियों को उचित और पर्याप्त मौके मिलें तो खेलों के मामले में देश झंडे गाड़ने में पीछे नहीं रह सकता। चानू से पहले रियो ओलंपिक में भारत को पदक दिलाने वाली महिला खिलाड़ियों में साक्षी मलिक और पी वी सिंधू को कौन भुला सकता है! इन खिलाड़ियों की ये उपलब्धियां इनकी अपनी कड़ी मेहनत और पक्के इरादे की कहानी ज्यादा हैं। आज भी स्थिति यह है कि प्रतिभा तो खूब बिखरी पड़ी हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में यहां तक पहुंचना सबके लिए संभव नहीं होता। ये दोष हमारी खेल नीतियों का ही ज्यादा है। स्थानीय स्तर पर खेलों को बढ़ावा देने के अगर प्रयास पहले से हो रहे होते तो आज भारत की स्थिति कुछ और होती। ओलंपिक या दूसरे अंतरराष्ट्रीय खेलों की पिछली पदक तालिकाओं पर गौर करें तो भारत की स्थिति कई बिंदुओं पर सोचने को मजबूर करने वाली ही रही है। क्यों हम शीर्ष पांच में आज तक अपनी जगह नहीं बना सके? क्यों नहीं किसी खेल आयोजन में ज्यादा से ज्यादा पदक जीत कर दुनिया को यह नहीं दिखा पाए कि विश्व गुरु भारत खेलों में भी सबका गुरु है? जाहिर है कि इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि भारत में ज्यादातर खेल संघ और संस्थाएं राजनीतिकों की मुट्ठी में रही हैं। ऐसे में नई प्रतिभाओं की तलाश का काम कौन और कैसे करता?

चानू की कामयाबी देश के खेल जगत पर फिर से नजर डालने का भी मौका है। देश में नई-नई खेल प्रतिभाओं को खोजना सबसे बड़ा काम है। इसके लिए सबसे पहले तो खेल संस्थाओं की कमान पूरी तरह से खिलाड़ियों के हाथ में ही सौंपनी होगी। तभी प्रतिभाओं की पहचान और उन्हें तैयार करने का काम आसान हो सकता है। ऐसा भी नहीं है कि पिछले पांच-सात सालों में खेलों की ओर सरकार का ध्यान न गया हो। अब कई राज्यों में खेल विश्वविद्यालयों की स्थापना पर भी काम हो रहा है। एक सवाल यह भी है कि भारत में जब क्रिकेट जैसा खेल वैश्विक कारोबार का रूप ले सकता है तो और दूसरे खेलों में यह प्रयोग क्यों नहीं हो सकता! इसके लिए पहल तो सरकारों को ही करनी होगी।

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