महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक यातायात प्रबंधन में हर स्तर पर अक्सर लापरवाही साफ नजर आती है। खास तौर से उन जगहों पर जहां सड़क संकेतक काम नहीं कर रहे होते या यातायात पुलिस कर्मी तैनात नहीं होते। वाहन चालकों के एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ से भी जाम की स्थिति पैदा हो जाती है।
हद तो तब हो जाती है, जब रैलियों, पदयात्रा और विरोध प्रदर्शन के दौरान सड़कें अवरुद्ध हो जाती हैं और वाहनों की लंबी कतारें लग जाती हैं। ऐसा लगता है कि यातायात नियम भीड़ में शामिल लोगों के लिए बने ही नहीं हैं! यहां तक कि एंबुलेंस और दमकल वाहनों को भी रास्ता देने की जरूरत नहीं समझी जाती। ऐसी ही एक घटना चंडीगढ़ में मंगलवार को देखने को मिली, जब विपक्षी दलों की पदयात्रा के दौरान यातायात जाम होने से पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के वाहन फंस गए। इसके बाद उच्च न्यायालय ने कड़ा संज्ञान लेते हुए चंडीगढ़ के पुलिस महानिदेशक को तलब कर यातायात व्यवस्था में सुधार करने के निर्देश दिए।
इसमें दोराय नहीं कि राष्ट्रीय राजमार्ग से लेकर संपर्क मार्गों तक यातायात जाम की समस्या अब आम बात हो गई है। यातायात नियमों की हर स्तर पर अनदेखी की जाती है। अक्सर यह देखा जाता है कि विभिन्न स्थानों पर लोग घंटों जाम में फंसे रहते हैं, जिससे न केवल उनका कीमती समय बर्बाद हो जाता है, बल्कि उन्हें कई तरह की परेशानियों से भी दो-चार होना पड़ता है। आए दिन इस तरह के मामले भी सामने आते रहते हैं कि यातायात जाम की वजह से एंबुलेंस को रास्ता नहीं मिला और उसमें ले जाए जा रहे मरीज को समय पर उपचार नहीं मिलने से उसकी मौत हो गई।
चंडीगढ़ में यातायात अवरुद्ध होने की घटना और उस पर उच्च न्यायालय की ओर से लिए गए तत्काल संज्ञान को व्यवस्था में सुधार की लिहाज से अहम माना जा रहा है। खबरों के मुताबिक, पुलिस महानिदेशक ने भरोसा दिया है कि शहर में इस तरह की घटना दोबारा न हो, इसके लिए उचित कदम उठाए जाएंगे। इससे स्पष्ट है कि अगर लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए, तो समस्या का समाधान आसानी से किया जा सकता है।
