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राहुल की राह

भाजपा ने राहुल के अध्यक्ष चुने जाने को कांग्रेस के परिवारवाद के तौर पर रेखांकित किया है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन भारत की राजनीति में परिवारवाद का दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि अब इसके लिए केवल कांग्रेस को कोसा नहीं जा सकता।

Author December 18, 2017 4:23 AM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी।

शनिवार को राहुल गांधी ने विधिवत पार्टी का अध्यक्ष पद संभाल लिया। कुछ दिन पहले ही वे निर्विरोध चुने जा चुके थे। यह कांग्रेस के नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव तो है ही, देश की राजनीति के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण घटना है। इससे पहले, सोनिया गांधी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं, उन्नीस साल। लिहाजा, इस नेतृत्व परिवर्तन को परिवार के भीतर पार्टी की सत्ता के हस्तांतरण के रूप में भी देखा जाएगा। राहुल नेहरू-गांधी वंश के छठे शख्स हैं जिनके हाथ में पार्टी की बागडोर आई है। और अध्यक्ष चुने जाते ही उन पर भाजपा का हमला भी तेज हो गया। भाजपा ने राहुल के अध्यक्ष चुने जाने को कांग्रेस के परिवारवाद के तौर पर रेखांकित किया है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन भारत की राजनीति में परिवारवाद का दायरा इतना बड़ा हो चुका है कि अब इसके लिए केवल कांग्रेस को कोसा नहीं जा सकता। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और द्रमुक जैसी पार्टियां भी परिवारों की जागीर बन चुकी हैं। यही नहीं, वंशवाद की लकीर पर चलने वाली कई पार्टियों के साथ खुद भाजपा गठबंधन में रही है। अकाली दल और शिवसेना के साथ उसका गठबंधन चल रहा है, जबकि बीजू जनता दल और द्रमुक के साथ वह अतीत में गठबंधन कर चुकी है। भाजपा के भीतर भी बहुत सारे नेता-पुत्रों के सांसद, विधायक बनने के मामले मिल जाएंगे।

बहरहाल, सवाल यह है कि राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष बनने से कांग्रेस को क्या हासिल होगा? देश की राजनीति में क्या फर्क पड़ेगा? एक समय था जब राहुल गांधी की छवि ‘अनिच्छुक राजनेता’ की बन गई या बना दी गई थी। पर अब वे निरंतर सक्रिय, संजीदा और चुनौती देने के अंदाज में नजर आ रहे हैं। गुजरात चुनाव का नतीजा जो हो, पहले अमेरिका दौरे और फिर गुजरात के चुनाव अभियान से राहुल ने यह तो साबित कर ही दिया है कि उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन उन्होंने कांग्रेस की कमान ऐसे वक्त संभाली है जब पार्टी की हालत खस्ता है। इसलिए उनके सामने चुनौतियां काफी बड़ी हैं। उन्हें पार्टी के संगठन को इतना ऊर्जावान और चुस्त-दुरुस्त बनाना है कि भाजपा समेत संघ परिवार से लोहा ले सके। नई प्रतिभाओं को तलाशना और पार्टी से जोड़ना है। पार्टी में पुराने अनुभवी नेताओं और युवा प्रतिभाओं का संतुलन बिठाना है। गठबंधन के लिए उपयुक्त सहयोगी कौन होंगे, 2019 के मद््देनजर मोदी से मुकाबले की रणनीति क्या होगी, यह सब तय करना है।

गुजरात और हिमाचल के बाद अब राहुल को कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना है। लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए भी उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है। शायद ही पहले के किसी कांग्रेस अध्यक्ष को पार्टी इतनी कमजोर अवस्था में मिली हो और उसके सामने पार्टी को पटरी पर लाने और उसे रफ्तार देने की इतनी कठिन चुनौतियां रही हों। पर चुनौतियां आदमी को निखारती भी हैं। अगर राहुल ने लगातार संकल्प, हिम्मत और परिपक्वता दिखाई तो पार्टी की उम्मीद से आगे बढ़ कर वे देश की उम्मीद भी बन सकते हैं। पार्टी की कमान सौंपे जाने के अवसर पर हुए समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने खुद को आदर्शवादी बताया और एक अलग तरह की राजनीति के लिए प्रयास करने का संकेत दिया। पर यह मौजूदा कांग्रेस से शायद ही संभव हो सके। क्या वे पार्टी को अपने घोषित मकसद के अनुरूप ढालने का जोखिम उठाएंगे?

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