मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया हो, लोकसभा एवं विधानसभा चुनाव हों या फिर जनगणना जैसे विशेष अभियान, इनका जिम्मा शिक्षकों तथा अन्य विभागीय कर्मियों को दिया जाता है। उन्हें बिना किसी त्रुटि या हड़बड़ी के पूरी सटीकता के साथ इस कार्य को अंजाम देना होता है। मगर इस दौरान उन्हें किस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, इस पर शायद ही सरकार और प्रशासनिक स्तर पर पहले कोई चर्चा होती हो या कोई समाधान तलाशने की कोशिश की जाती हो। यानी परिस्थिति जो भी हो, इन कर्मियों को हर हाल में काम पूरा करना होता है।

ऐसे में कई बार काम का बोझ या चुनौतीपूर्ण हालात न केवल शारीरिक एवं मानसिक परेशानियों को बढ़ा देते हैं, बल्कि संबंधित कर्मी की जान तक चली जाती है। ओडिशा में ऐसे ही दो स्कूली शिक्षकों की लू लगने से मौत हो गई, जिन्हें जनगणना के कार्य में नियुक्त किया गया था। खबरों के मुताबिक, अलग-अलग घटनाओं में जब ये शिक्षक घर-घर जाकर सर्वेक्षण करने के बाद स्कूल लौटे, तो बेहोश हो गए। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में तैनात कई खंड स्तरीय अधिकारियों की मृत्यु हो जाने की खबरें आई थीं। पीड़ित पक्षों का दावा था कि काम का अत्यधिक बोझ और मानसिक परेशानी मौत का कारण बना, हालांकि अधिकांश मामलों में आधिकारिक स्तर पर व्यक्तिगत समस्या का ही हवाला दिया गया। चुनाव के दौरान भी इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं। अब देश में जनगणना का कार्य शुरू हुआ है और अभी से ऐसी घटनाएं सामने आने लगी हैं।

अगर शिक्षकों की बात की जाए, तो लंबे समय से यह मांग की जाती रही है कि उनकी जिम्मेदारी को शिक्षण कार्य तक ही सीमित रखा जाए, क्योंकि इससे बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। सवाल है कि इस तरह के विशेष सरकारी अभियानों में तैनात किए जाने वाले कर्मियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी और जवाबदेही किसकी है? शासन-प्रशासन को इस बात पर गंभीरता से ध्यान देना होगा कि ऐसे कर्मियों को पेश आने वाली परेशानियों का तत्काल निराकरण किया जाए, ताकि उनकी जान को किसी तरह का खतरा न हो।