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संपादकीयः संबद्धता की गुत्थी

स्कूलों को संबद्धता देने के जो नियम होते हैं, उनके मुताबिक बोर्ड को हर साल 30 जून या उससे पहले मिलने वाले स्कूलों के आवेदनों पर विचार कर छह महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
Author April 10, 2018 02:01 am
नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया है कि वह स्कूलों को संबद्धता देने के मामले में फुर्ती से काम नहीं कर रहा है।

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को इस बात के लिए आड़े हाथों लिया है कि वह स्कूलों को संबद्धता देने के मामले में फुर्ती से काम नहीं कर रहा है। पिछले हफ्ते संसद में पेश की गई कैग की रिपोर्ट के मुताबिक स्कूलों को बोर्ड की संबद्धता देने के मामले में सीबीएसई जिस तरह से काम कर रहा है, वह चिंताजनक है। कैग ने इस बात पर खिन्नता जाहिर की कि लंबे समय तक स्कूलों के आवेदन बोर्ड के पास पड़े रहते हैं और उन पर फैसले नहीं किए जाते। कैग की इस तरह की टिप्पणियां बोर्ड के कामकाज के तरीके पर सवाल खड़े करती हैं। यह इसलिए भी चिंताजनक है कि सीबीएसई सरकारी निकाय है जिसे बेहतर शिक्षा के लिए काम करना है।

स्कूलों को संबद्धता देने के जो नियम होते हैं, उनके मुताबिक बोर्ड को हर साल 30 जून या उससे पहले मिलने वाले स्कूलों के आवेदनों पर विचार कर छह महीने के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी होती है। लेकिन कैग ने पाया कि बोर्ड ने दो सौ तीन में से एक सौ चालीस स्कूलों को ही संबद्धता प्रदान की और इनमें मात्र उन्नीस स्कूल ऐसे थे जिनको छह महीने के भीतर संबद्धता मिली। बाकी एक सौ इक्कीस स्कूलों को संबद्धता देने और इस बारे में सूचित करने में सात महीने से तीन साल तक लग गए। कैग ने जो खुलासा किया है, वह चौंकाने वाला है। कई स्कूलों को तो बिना निरीक्षक समिति बनाए ही मान्यता दे दी गई। ऐसे में जो स्कूल बिना नियमों पर खरे उतरे जोड़-तोड़ कर मान्यता हासिल करते हैं, वे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दे पाएंगे? ऐसे स्कूल छात्रों की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा का खयाल नहीं रखते और उनका एकमात्र मकसद पैसा कमाना होता है। ऐसे स्कूल बोर्ड के तय मानकों का पालन कैसे और क्यों करेंगे, यह सोचने वाली बात है।

सीबीएसई मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत आने वाला संगठन है। स्कूलों को मान्यता देने से लेकर बोर्ड की परीक्षाएं और प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराने जैसी अहम जिम्मेदारी बोर्ड की ही है। सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा तैयार पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। यानी जो भी स्कूल सीबीएसई से संबद्ध होगा, उसे बोर्ड के तय मानकों का पूरा पालन करना होगा। ऐसे में अगर स्कूलों को बोर्ड से मान्यता नहीं मिलती है तो वे अपने हिसाब से स्कूल चलाते रहते हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा मार बच्चों के अभिभावकों पर पड़ती है। स्कूल मोटी फीस वसूलते हैं। वर्दी, किताबें, अन्य स्टेशनरी आदि अपने यहां से खरीदने को बाध्य करते हैं जो बाजार की तुलना में काफी महंगी बेची जाती हैं।

ज्यादातर स्कूलों के पास मानकों के अनुरूप न्यूनतम बुनियादी ढांचा भी नहीं होता। कैग ने अपनी जांच में कई स्कूलों में साफ-सफाई का घोर अभाव पाया। स्कूलों के नाम पर गली-गली में शिक्षा की दुकानें आसानी से देखी जा सकती हैं। हालांकि स्कूलों को मान्यता देने में देरी के पीछे बड़ी और व्यावहारिक वजह यह हो सकती है कि ज्यादातर स्कूल बोर्ड के पैमाने पर खरे नहीं उतर पाते। स्कूलों को मान्यता देने की प्रक्रिया लंबी होती है। लेकिन इस समस्या का समाधान तो बोर्ड को ही निकालना होगा।

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