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परीक्षा और पैगाम

दसवीं और बारहवीं में सफलता की दर अधिक होने के बावजूद आगे की पढ़ाई में यानी उच्चशिक्षा के संस्थानों में लड़कियों की वैसी उपस्थिति क्यों नहीं दिखती?

Author नई दिल्ली | May 23, 2016 04:30 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

बीते शनिवार को सीबीएसइ यानी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने बारहवीं की परीक्षा के परिणाम घोषित कर दिए। इन नतीजों में कई उल्लेखनीय बातें हैं। एक यह कि इस बार भी लड़कियों का प्रदर्शन लड़कों से बेहतर है। पर यह एक सिलसिले के दोहराव से कुछ ज्यादा है। औसत परिणाम में तो लड़कियां आगे हैं ही, शिखर पर भी वही हैं। सर्वोच्च स्थान दिल्ली के मान्टफोर्ट स्कूल की सुकृति गुप्ता को मिला है। प्रथम स्थान पाने के साथ ही सुकृति ने दो विषयों में सौ फीसद और तीन विषयों में निन्यानबे फीसद और इस तरह पांच सौ में चार सौ सत्तानबे यानी 99.4 फीसद अंक हासिल किए हैं। उसके बाद दूसरे और तीसरे स्थान पर भी लड़कियां हैं। उनके अंक सर्वोच्च स्थान से क्रमश: सिर्फ एक और सिर्फ दो कम हैं। अलबत्ता एक छात्र ने भी तीसरा स्थान हासिल किया है।

बारहवीं का समग्र परिणाम 83.05 फीसद आया, जो कि पिछली बार से 2.38 फीसद अधिक है। लड़कियों और लड़कों के नतीजे अलग-अलग देखें तो करीब दस फीसद का अंतर है। छात्राओं का नतीजा 88.58 फीसद है, जबकि छात्रों का 78.85 फीसद। शिखर की सूची में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ने बाजी मारी है, पर कुल परिणाम के संदर्भ में दक्षिणी क्षेत्र की उपलब्धि ज्यादा चमकदार है। तिरुवनंतपुरम का पास प्रतिशत 97.61 फीसद रहा, वहीं चेन्नई का 92.63 प्रतिशत। इस बार संघ लोक सेवा आयोग के पिछले दिनों आए परीक्षा परिणाम में भी एक छात्रा ने ही सर्वोच्च स्थान हासिल किया। जाहिर है, इन नतीजों में हमारे समाज के लिए एक संदेश निहित है, वह यह कि लड़कियां किसी भी मायने में कम नहीं, बल्कि उन्हें मौका, माहौल और प्रोत्साहन मिले तो वे बेहतर प्रदर्शन भी कर सकती हैं।

यों दसवीं या बारहवीं के परीक्षा परिणाम में लड़कियों का प्रदर्शन बेहतर रहने की कुछ सामान्य वजहें चिह्नित की जा सकती हैं। वे घर में अधिक समय रहती हैं, इसलिए पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दे पाती हैं। फिर, उन पर खुद को साबित करने का मनोवैज्ञानिक दबाव भी ज्यादा होता है। पर सवाल है कि दसवीं और बारहवीं में सफलता की दर अधिक होने के बावजूद आगे की पढ़ाई में यानी उच्चशिक्षा के संस्थानों में उनकी वैसी उपस्थिति क्यों नहीं दिखती? इसी तरह का दूसरा सवाल यह है कि नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी कम क्यों दिखती है?

इसका कारण हमारे समाज की संरचना और मानसिकता में है, जहां लड़कियों और महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने और आगे बढ़ने की राह में तरह-तरह की धारणाएं और बाधाएं आड़े आती हैं। कहीं यह समाज के स्तर पर होता है, कहीं परिवार के स्तर पर, और बहुत सारे मामलों में दोनों स्तरों पर। यों हमारे समाज का एक हिस्सा जरूर ऐसा है, और ऐसे परिवारों की तादाद बढ़ती गई है, जो बेटियों को भी अपनी प्रतिभा निखारने और तरक्की करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। पर गौरतलब है कि सीबीएसइ की बारहवीं की परीक्षा में जिस हरियाणा की एक छात्रा ने दूसरा और एक ने तीसरा स्थान हासिल किया है, उसकी छवि बालक-बालिका अनुपात के लिहाज से कैसी है? यह अनुपात सुधरना चाहिए, इस परीक्षा परिणाम का एक संदेश यह भी है।

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