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जाति की पहचान

जाति-पांति, छुआछूत, लैंगिक और सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के खिलाफ कानून में दंडात्मक प्रावधान हैं, मगर हकीकत यह है कि आज भी बहुत सारी..

Author नई दिल्ली | November 4, 2015 9:35 PM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

जाति-पांति, छुआछूत, लैंगिक और सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के खिलाफ कानून में दंडात्मक प्रावधान हैं, मगर हकीकत यह है कि आज भी बहुत सारी जगहों पर बहुत सारे लोग प्रत्यक्ष रूप से जातिगत आधार पर भेदभाव करते नजर आते हैं। जाति के आधार पर लोगों को प्रताड़ित किया और उन्हें समाज की मुख्य धारा से अलग जीवन बसर करने को मजबूर किया जाता है। इसका ताजा उदाहरण तमिलनाडु के तिरुनेलवल्ली जिले का है। इस जिले के सरकारी स्कूलों में बच्चों को अपनी जाति की पहचान जाहिर करने वाले प्रतीक धारण करने पड़ते हैं। हाथ में लाल, पीले, नीले, हरे, सफेद आदि रंगों के धागे बांध कर, माथे पर अलग-अलग रंगों के तिलक लगा कर या फिर गले में अपनी जाति के नेताओं की तस्वीरों वाले लॉकेट पहन कर जाहिर करना पड़ता है कि वे तथाकथित उच्च जाति के हैं या निम्न जाति के। यह परिपाटी जिले के शिक्षा अधिकारियों की जानकारी में पिछले कई सालों से है।

कुछ साल पहले जब निम्न कही जाने वाली जाति के कुछ विद्यार्थियों ने इस प्रथा का विरोध किया तो उन्हें स्कूल छोड़ने पर मजबूर किया गया। कुछ दिनों पहले तिरुनेलवेली के जिलाधिकारी ने शिक्षा अधिकारियों से कहा कि इस तरह हाथ में रंगीन धागे बांध कर, गले में लॉकेट और माथे पर अलग-अलग रंगों के तिलक लगा कर अपनी जाति जाहिर करने की प्रथा को समाप्त किया जाना चाहिए, मगर उस पर अभी तक कोई कारगर कदम नहीं उठाया जा सका है। हैरानी की बात है कि वहां की सरकार को संवैधानिक मूल्यों की परवाह नहीं है। इस तरह जाति के आधार पर भेदभाव की परिपाटी को पोस कर आखिर वह बच्चों को किस तरह की शिक्षा देना चाहती है।

हालांकि जातिवाद और ऊंच-नीच के आधार पर भेदभाव का मर्ज केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है। अन्य राज्यों से भी जाति के आधार पर तथाकथित नीची जाति के लोगों को प्रताड़ित करने की शिकायतें आए दिन मिलती हैं। पिछले महीने जोधपुर में एक दलित किशोर को इसलिए उसके अध्यापक ने बुरी तरह पीटा कि उसने सवर्ण बच्चों के लिए रखे बर्तनों में से अपने लिए खाने की थाली उठा ली। अनेक राज्यों से स्कूलों में दलित और सवर्ण बच्चों के लिए अलग-अलग मध्याह्न भोजन तैयार करने, अलग-अलग पंक्ति में उन्हें बिठा कर खाना परोसने की शिकायतें भी मिलती रही हैं।

विद्यालय नैतिकता, बराबरी और आपसी भाईचारे का पाठ पढ़ाने की जगह है, अगर वहां इस तरह बच्चों को बांट कर देखा और व्यवहार सिखाया जाता है तो आखिर समरसता की नींव मजबूत करने का सपना किसके बूते देखा जा सकता है! छिपी बात नहीं है कि जब से जाति के आधार पर राजनीतिक समीकरण बनाए और प्रचारित किए जाने लगे हैं, तब से समाज में जातिवाद की जड़ें और गहरी हुई हैं। राजनीतिक दलों ने समाज को जातियों के आधार पर बांट दिया है। हर राजनीतिक दल किसी न किसी जाति और समुदाय की रहनुमाई का बढ़-चढ़ कर दावा करता है। ऐसे में सरकारों से जातिवाद मिटाने की उम्मीद धुंधली होती गई है।

विचित्र है कि जो लोग छुआछूत, जातिवाद और सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए प्रयास करते हैं, उन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाता है, पर सरकारें शरारती तत्त्वों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठातीं। क्या सामाजिक समरसता और बराबरी की शिक्षा सरकारों का सरोकार नहीं!

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