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संपादकीयः जाति की हिंसा

तमिलनाडु के त्रिपुर में सम्मान के नाम पर सरेआम हत्या की घटना दहला देने वाली और सामाजिक विकास के लिहाज से गंभीर चिंता में डालने वाली है। इ
Author March 16, 2016 03:55 am
शंकर-कौशल्या की फाइल फोटो

तमिलनाडु के त्रिपुर में सम्मान के नाम पर सरेआम हत्या की घटना दहला देने वाली और सामाजिक विकास के लिहाज से गंभीर चिंता में डालने वाली है। इससे अफसोस की बात और क्या होगी कि जिस दौर में जाति की जड़ता तोड़ने को सामाजिक विकास के लिए एक जरूरी प्रक्रिया के तौर पर देखा जा रहा हो, उसमें किसी युवा जोड़े को इसलिए मार डाला जाए कि उसने प्रेम और विवाह में जाति के सवाल को पीछे छोड़ दिया था।

इंजीनियरिंग के विद्यार्थी दलित पृष्ठभूमि के बाईस वर्षीय शंकर और तमिलनाडु की अति पिछड़ी जाति में दर्ज थेवर जाति की कौशल्या ने प्रेम विवाह किया था। लड़की के परिवार वालों को यह संबंध स्वीकार नहीं था। कौशल्या की शिकायत के मुताबिक उसे अपने घर वालों से लगातार धमकियां मिल रही थीं और इसी के मद्देनजर उसने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी। लेकिन पुलिस ने वक्त पर ध्यान नहीं दिया और रविवार दोपहर को भरे बाजार में तीन लोगों ने धारधार हथियारों से शंकर और कौशल्या पर हमला किया।

शंकर ने मौके पर ही दम तोड़ दिया और कौशल्या गंभीर रूप से जख्मी हो गई। अब दबाव बढ़ने के बाद कौशल्या के परिवार के चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन यह कोई सामान्य आपराधिक घटना नहीं है, जिसे सिर्फ कानूनी कार्रवाई करके खत्म मान लिया जाए। यह समाज में जाति-व्यवस्था और उसकी जड़ताओं में घुली प्रत्यक्ष या परोक्ष हिंसा के मनोविज्ञान का नतीजा है, जिसमें हर जाति के दायरे में सिमटे लोग अपने से ‘निचली’ कही जाने वाली जाति को कमतर समझते हैं, कई बार उससे घृणा करते हैं।

तमिलनाडु की यह घटना इसलिए भी एक बड़ी विडंबना है कि वहां जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के खिलाफ आंदोलन की लंबी परंपरा रही है और एक समय इसके सकारात्मक सामाजिक नतीजे भी देखे गए थे, कमजोर दलित-पिछड़ी जाति की सामाजिक स्थिति में काफी सुधार भी हुआ था। लेकिन पिछले तीन-चार दशकों की राजनीति के दौरान ऐसा क्या हुआ कि कभी जातिगत वर्चस्व के विरुद्ध मिल कर संघर्ष करने वाले समाज में पिछड़ी जातियों ने अब कमजोर अनुसूचित जातियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। करीब दो साल पहले तमिलनाडु में ही दिव्या और दलित युवक इलावरसन के प्रेम संबंध के बाद भी हिंसा और आखिरकर इलावरसन के दुखद अंत ने समूचे देश में लोगों का ध्यान खींचा था। हरियाणा और देश के दूसरे इलाकों में भी कथित सम्मान के नाम पर बर्बर तरीके से हत्या की घटनाएं सामने आती रहती हैं।

सवाल है कि जब इस हकीकत को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि जाति-व्यवस्था सामाजिक विकास की सबसे बड़ी बाधक-तत्त्व रही है, इसे लेकर व्यापक आंदोलनों का एक इतिहास रहा है, तब भी जाति को लेकर जड़ता इस कदर हिंसक क्यों बनी हुई है कि अंतरजातीय प्रेम संबंधों और विवाह करने वाले जोड़ों को सरेआम मार डाला जाता है? जाति की पहचान पर गर्व करते लोगों के सोचने-समझने का दायरा इतना संकुचित कैसे बना हुआ है कि जिस तरह के संबंध सामाजिक विकास में एक अहम और सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं, उन्हें वे अपने सम्मान के खिलाफ मानते हैं? यह सवाल सिर्फ समाज नहीं, बल्कि सरकार के लिए भी है कि समाज की चेतना के विकास में नीतिगत स्तर पर उसकी भूमिका क्या रही है और आगे क्या होगी!

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