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डूबती नैया

कांग्रेस पार्टी एक बार फिर अपने भीतर उठते सवालों से जूझ रही है। असंतुष्ट आवाजें उसे परेशान कर रही हैं।

congressसांकेतिक फोटो।

कांग्रेस पार्टी एक बार फिर अपने भीतर उठते सवालों से जूझ रही है। असंतुष्ट आवाजें उसे परेशान कर रही हैं। ऐसे समय में जब पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है, राजनीतिक दल अपना जनाधार बटोरने में जुटे हैं, कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता जम्मू में इकट्ठा होकर अपनी अंतरात्मा की आवाज सुना रहे हों, तो इसे क्या कहेंगे। राजनीतिक दलों के अच्छे और बुरे दिन आते रहते हैं, पर बुरे दिनों में जो नई रणनीति के साथ उठने का साहस रखते हैं, वही दुबारा कामयाबी हासिल कर पाते हैं।

इस दृष्टि से कांग्रेस में लगातार हताशा नजर आ रही है। फिलहाल उसके केवल दो नेता जमीन पर उतर कर संघर्ष करते देखे जा रहे हैं और वे दोनों बिल्कुल नए हैं। राहुल गांधी चुनावी राज्य तमिलनाडु के दौरे पर हैं, तो प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में किसानों, मजदूरों, दलितों के मुद्दे उठाती रैलियां कर रही हैं। मगर मध्यप्रदेश के एक-दो वरिष्ठ नेताओं को छोड़ कर केंद्रीय कमान संभालने वालों में से एक में भी ऊर्जा नजर नहीं आ रही। जम्मू में गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, राज बब्बर आदि ने एक सामाजिक कार्यक्रम के मंच पर पहुंच यह स्वीकार किया कि कांग्रेस पहले से काफी कमजोर हुई है, मगर उसे मजबूत करने के लिए उन्होंने खुद जमीन पर उतरना मुनासिब नहीं समझा।

हालांकि यह पहली बार नहीं है, जब इन वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस में जान फूंकने के लिए हुंकार भरी है। पहले ये सभी नेता पार्टी को पुनर्नवा करने से संबंधित अपने सुझाव पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिख कर दे चुके हैं। उनकी नीयत में खोट नहीं देखी जा सकती, सचमुच वे कांग्रेस को फिर से ताकतवर देखना चाहते हैं। मगर हकीकत यह है कि पार्टी वातानुकूलित कमरों में बैठ कर नहीं चलाई जाती, उसके लिए जमीन पर उतर कर पसीना बहाना पड़ता है। सिर्फ सैद्धांतिक बातों से जनाधार जोड़ कर रखना संभव नहीं हो पाता।

मगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस हकीकत को जानते हुए भी पसीना बहाने को तैयार नजर नहीं आते। जबसे वह सत्ता से बाहर हुई है, केंद्र में लोग उसी से विपक्ष की भूमिका निभाने की उम्मीद करते हैं, पर अनेक अनुकूल अवसर आने के बावजूद उसके नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे नजर आए। दरअसल, कांग्रेस नेताओं को आदत पड़ चुकी है कि जब सत्ता हाथ में आ जाती है, तो उसमें हिस्सेदारी के लिए तो फौरन लपक लेते हैं, पर जमीन पर उतरने से बचते रहते हैं।

कांग्रेस तब तक मजबूत विकल्प नहीं बन सकती जब तक कि वह परिवारवाद के लांछनों से खुद को मुक्त न कर ले। फिर इस हकीकत को उसे स्वीकार करके जमीन पर उतरना पड़ेगा कि पहले जो जिला और ब्लॉक स्तर पर उसकी इकाइयां हुआ करती थीं, अब वे लगभग ध्वस्त हो चुकी हैं, नए सिरे से उनकी बुनियाद रखनी है। इसके लिए कठोर फैसले करते हुए कांग्रेस कार्य समिति का पुनर्गठन करना होगा, जिसमें बुजुर्ग हो चली पीढ़ी की जगह ऊर्जावान नई पीढ़ी को लाना पड़ेगा।

कई मौकों पर सुझाव दिए जा चुके हैं कि पुराने और नए दोनों तरह के नेतृत्व का तालमेल बना कर पार्टी का पुनर्गठन किया जाए, तो उसमें फिर से जान आ सकती है। मगर वरिष्ठ नेता अपनी जगह छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जब तक ऊपर से नीचे तक पार्टी का पुनर्गठन नहीं होगा, उसकी जिम्मेदारियां युवा हाथों में नहीं पहुंचेगी, कांग्रेस का जमीनी आधार मजबूत होना असंभव है।

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