किसी एक हादसे के बाद का सबक यह होना चाहिए कि ऐसे तमाम इंतजामों को लेकर हर स्तर पर सतर्कता बरती जाए, जिससे भविष्य में वैसी स्थितियों से बचा जा सके। दिल्ली के साकेत इलाके में हाल ही में एक इमारत गिरने और उसमें कई लोगों के मारे जाने की त्रासदी सामने आई थी। मगर उसके बाद भी संबंधित महकमों को नींद से जागना जरूरी नहीं लगा। नतीजतन, दिल्ली के ही रोहिणी इलाके में बुधवार को भारी बारिश के दौरान एक चारमंजिला इमारत ढह गई, जिसमें कम से कम तीन लोगों की जान चली गई।
सवाल है कि ऐसा किसकी लापरवाही से हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। गौरतलब है कि हादसे से पहले इमारत लगभग बन चुकी थी और अंतिम दौर में जल आपूर्ति और अपशिष्ट निकासी के लिए पाइप लगाने का काम चल रहा था। ऐसे में इमारत गिरने की आखिर क्या वजह हो सकती है? अगर इस इमारत का नक्शा ‘सरल योजना’ के तहत मंजूर किया गया था, तो क्या यह सुरक्षा मानकों पर खरा था? इसकी पहले से जांच होती, तो शायद हादसा टल सकता था।
यह बेवजह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को देश भर में गैरकानूनी या असुरक्षित इमारतों और बुनियादी ढांचे से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली, गुरुग्राम, पटना और तमिलनाडु के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने उन जर्जर इमारतों को गिराने या खाली कराने के लिए की गई कार्रवाई के संदर्भ में स्थिति का ब्योरा मांगा है, जिनसे आपदा का खतरा हो सकता है।
दरअसल, वर्षों से आवास निर्माण संबंधी नियमों की अनदेखी होती आई है। यही वजह है कि अनियोजित तरीके से शहर बसते चले गए। पुणे में तो कचरे के पहाड़ के पास इमारत खड़ी कर ली गई। नतीजा यह कि बुधवार को बारिश के बाद कचरे के भारी दबाव की वजह से इमारत गिर गई। दिल्ली में जिस तरह से अनियोजित निर्माणों को बढ़ावा मिला है, उसी का परिणाम है कि आए दिन इमारतें गिरती हैं।
सवाल है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए जवाबदेही क्यों नहीं तय की जा रही है। गैर-अधिसूचित क्षेत्रों और अनधिकृत कॉलोनियों में प्राय: भवन उपनियमों का उल्लंघन कर कई मंजिला इमारतें बनाई जाती हैं, तो इसे क्यों नहीं रोका जाता।
