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हादसों की उड़ान

सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के तकनीशियनों को ले जा रहे विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के बाद एक बार फिर सेना के विमानों के रखरखाव और संचालन पर सवाल उठे हैं..

Author नई दिल्ली | December 24, 2015 12:05 AM
इंदिरा गांधी हवाईअड्डे के पास दुर्घटनाग्रस्त बीएसएफ का विमान।

सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के तकनीशियनों को ले जा रहे विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के बाद एक बार फिर सेना के विमानों के रखरखाव और संचालन पर सवाल उठे हैं। बीएसएफ के इस विमान ने दिल्ली के पालम हवाई अड््डे से सुबह रांची के लिए उड़ान भरी। मगर पांच मिनट के भीतर ही उसमें तकनीकी खराबी आ जाने की वजह से उसे वापस उतारने की कोशिश करनी पड़ी। उतरते वक्त विमान इस कदर संतुलन खो बैठा कि हवाई अड्डे से पहले कुछ दूरी पर एक पेड़ से टकरा कर क्षतिग्रस्त हो गया और उसमें सवार सभी दस लोग मारे गए।

विमान में बीएसएफ के तकनीशियन सवार थे, जो रांची में खराब हुए एक हेलीकॉप्टर को ठीक करने जा रहे थे। ये सभी विमान के दक्ष तकनीशियन और चालक थे। इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि चालक ने भारी नुकसान रोकने के लिए विमान को ऐसे स्थान की तरफ मोड़ दिया, जिससे कि कोई दूसरा बड़ा हादसा होने से टल गया। जिस जगह यह विमान गिरा उसके थोड़े से दायरे में ही रेलवे स्टेशन और विमानों में भरे जाने वाले र्इंधन का डिपो है। आसपास सघन रिहाइशी कॉलोनियां हैं। अगर विमान उनमें से किसी जगह गिरता तो यह हादसा काफी बड़ा साबित हो सकता था। जाहिर है, बीएसएफ के इन तकनीशियनों ने उड़ान भरने से पहले विमान की तकनीकी जांच की होगी, पर खामी उनकी पकड़ में नहीं आ सकी तो इसकी वजह अचानक इंजन में आई कोई बड़ी खराबी रही होगी।

दुर्घटनाग्रस्त हुआ विमान बीस साल पुराना था। बताया जा रहा है कि छह महीने पहले ही कनाडा में उसके इंजनों की ओवरहालिंग कराई गई थी। इस आधार पर बीएसएफ के अधिकारियों का कहना है कि वह बिल्कुल ठीकठाक अवस्था में था। मगर इस तरह एक बीस साल पुराने विमान को बहुत भरोसेमंद नहीं माना जा सकता। हैरानी है कि सेना के विमान हादसों से अब तक कोई सबक लेना जरूरी नहीं समझा गया है। पिछले सात सालों में सुखोई और मिग समेत करीब तिरासी विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इसके पीछे यह नहीं माना जा सकता कि उन्हें उड़ाने वाले चालक कुशल नहीं थे। दरअसल, सेना और सुरक्षाबलों के विमानों, हेलीकॉप्टरों का समुचित रखरखाव न हो पाना इसके पीछे बड़ा कारण है। वैसे ही विमानों की खरीद में होने वाली देरी और उनके लगातार दुर्घटनाग्रस्त होने की वजह से सेनाओं और सुरक्षाबलों के पास विमानों की कमी है। इस तरह वर्षों पुराने विमानों के इंजन आदि को दुरुस्त करा कर चलाने का प्रयास किया जाता है।

फिर उनके रखरखाव पर उस तरह ध्यान नहीं दिया जा पाता, जिस तरह व्यावसायिक विमानों पर दिया जाता है। ऐसे में सेना और सुरक्षा बलों के चालकों को एक तरह से जान हथेली पर लेकर उन विमानों को उड़ाना पड़ता है। मिग विमान हादसों के बाद हर बार इसकी वजहों की जांच कराने का आश्वासन दिया गया, मगर आज तक इसका कोई उपाय नहीं निकाला जा सका है कि आखिर सेना को पुराने विमानों से किस तरह मुक्ति दिलाई जा सकती है। जब सड़कों पर चार पहिया वाहनों की मियाद पंद्रह साल तय की जाती है, तो विमानों को किस तर्क पर बीस साल पुराने हो जाने पर भी उड़ान भरने की इजाजत दी जाती है। जब तक सरकार इस समस्या से निपटने के लिए गंभीरता नहीं दिखाती, ऐसे हादसों पर अंकुश लगाना मुश्किल बना रहेगा।

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