भारत में लोकतंत्र की परंपरा बहुत मजबूत रही है और यहां नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार संविधान के तहत मिला हुआ है। मगर इसके साथ ही कुछ जिम्मेदारियां भी अभिन्न हैं, जो आपस में मिल कर ही देश में सद्भाव और सहयोग पर आधारित समाज को जीवन देती हैं। विडंबना यह है कि कई बार अभिव्यक्ति की आजादी पर पूर्वाग्रह और महज धारणा पर आधारित राय हावी दिखती है और इसे किसी व्यक्ति या समुदाय को कठघरे में खड़ा करने का औजार बना लिया जाता है।
अपनी प्रभावी संप्रेषण शक्ति और लोगों तक व्यापक पहुंच रखने वाले कला माध्यम के रूप में फिल्मों में अभिव्यक्ति के रचनात्मक पक्ष का इस्तेमाल करते हुए बड़े से बड़े प्रश्नों पर विचार किया जाता रहा है और इसे सभी स्तरों पर स्वीकार्यता भी मिलती रही है। मगर अफसोस की बात यह भी है कि इसी सुविधा का कई बार गलत फायदा भी उठाया जाता है। अभिव्यक्ति के नाम पर किसी फिल्म में परोसी गई कहानी के जरिए किसी समुदाय के बारे में गलत धारणा बनाने की कोशिश की जाती है।
इसी तरह, कुछ नेता भी अपनी जिम्मेदारियों और सीमाओं को ताक पर रख कर बेहिचक ऐसे बयान देते हैं, जिससे अलग-अलग समुदायों के बीच द्वेष पैदा होता है। जबकि इसका नतीजा इस रूप में भी सामने आ सकता है कि अलग-अलग समुदायों के बीच सद्भावना आधारित संवाद या संबंध पीछे छूट जाए।
जाहिर है, देश को इसके दूरगामी नुकसान हो सकते हैं। शायद यही वजह है कि हाल ही में अपने शीर्षक की वजह से विवाद के घेरे में आई एक फिल्म पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए भाईचारा जरूरी है। इस मामले में न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने अपने अलग फैसले में कहा कि सरकारी और गैरसरकारी सहित किसी भी जानी-मानी हस्ती और खासतौर पर ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए भाषण, मीम, कार्टून या दृश्य माध्यमों के जरिए किसी भी समुदाय को बदनाम करना, उस पर धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर निशाना साधना संविधान का उल्लंघन है।
दरअसल, पिछले कुछ समय से देश भर में अलग-अलग संदर्भ में कुछ नेताओं के बयानों या फिल्मों ने कई बार विवाद की स्थिति खड़ी कर दी। सार्वजनिक रूप से वैसी बातें करने में भी संकोच नहीं किया गया, जिसका कोई मजबूत आधार नहीं था, लेकिन उसने जन मानस के बीच राय बनाने में भूमिका निभाई। वे फिल्मों में चित्रित ब्योरे हों या किसी नेता का बयान, ऐसे अनेक मौके सामने आए, जब उसकी वजह से नाहक विवाद खड़ा हुआ, आपसी सद्भाव को नुकसान पहुंचा और यहां तक कि कोई खास समुदाय अपने आपको कठघरे में खड़ा या असुरक्षित महसूस करने लगा।
सवाल है कि किसी व्यक्ति या समुदाय को लक्ष्य कर बोलने की आजादी के तहत जो भी कहा जाता है, क्या कभी उसके आधार और असर को लेकर भी विचार करने की कोशिश की जाती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सद्भावना और आपसी भाईचारा देश के संविधान के बुनियादी उद्देश्यों में से एक है। अनुच्छेद 51ए(ई) के तहत हर नागरिक का यह बुनियादी कर्तव्य है कि वह धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं की सीमा से अलग होकर नागरिकों के बीच सद्भावना और सहयोग को बढ़ावा दे। मगर धर्म, भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर अगर किसी व्यक्ति या समुदाय को निशाना बनाया जाता है, तो यह संविधान और मानवीय मूल्यों का विरुद्ध है।
